आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । आदिवासी बाहुल्य जनपद सोनभद्र में दूर-दराज के गांवों से गरीब और जरूरतमंद फरियादी अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद लेकर तहसील मुख्यालय पहुंचते हैं। आने-जाने का किराया और दिनभर का समय खर्च कर वे अधिकारियों के सामने अपनी फरियाद रखते हैं, लेकिन संपूर्ण समाधान दिवस के आंकड़े सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या फरियादियों को वास्तविक समाधान मिल रहा है या फिर उन्हें कार्रवाई के आश्वासन के साथ वापस लौटना पड़ रहा है?
अक्टूबर के प्रथम शनिवार को जिले की चारों तहसीलों में आयोजित संपूर्ण समाधान दिवस में कुल 191 शिकायतें सुनी गईं। इनमें मौके पर महज 21 मामलों का निस्तारण हो सका, जबकि 170 प्रकरणों को संबंधित अधिकारियों को समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण निस्तारण के निर्देश के साथ भेज दिया गया। यानी करीब 89 फीसदी शिकायतों का तत्काल समाधान नहीं हो सका।
दुद्धी में 65 फरियाद, समाधान सिर्फ दो का –
आदिवासी अंचल से बड़ी संख्या में फरियादियों के पहुंचने वाले दुद्धी तहसील में जिलाधिकारी चर्चित गौड़ और पुलिस अधीक्षक अभिषेक वर्मा ने शिकायतें सुनीं। यहां 65 शिकायतें आईं, लेकिन मौके पर सिर्फ दो मामलों का निस्तारण हुआ। शेष 63 शिकायतें संबंधित अधिकारियों के पास जांच और कार्रवाई के लिए भेजी गईं। भूमि विवाद से जुड़े मामलों में स्थलीय जांच कर निस्तारण कराने के निर्देश दिए गए। जिलाधिकारी ने अधिकारियों से शिकायतों का निस्तारण करने के बाद शिकायतकर्ताओं का फीडबैक लेने और प्रत्येक मामले में गंभीरता से जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा।
रॉबर्ट्सगंज, ओबरा और घोरावल में भी तस्वीर लगभग एकसमान –
रॉबर्ट्सगंज तहसील में 29 शिकायतों में सात, ओबरा में 44 में छह और घोरावल में 53 शिकायतों में छह मामलों का मौके पर निस्तारण हुआ। बाकी क्रमशः 22, 38 और 47 शिकायतें अधिकारियों को समयबद्ध निस्तारण के लिए सौंप दी गईं। वहीं चारों तहसीलों के आंकड़े जोड़ने पर तस्वीर साफ है 191 फरियादियों ने अपनी समस्या रखी, लेकिन सिर्फ 21 को मौके पर समाधान मिला।
किराया खर्च कर पहुंचा फरियादी, हाँथ आया सिर्फ आश्वासन –
सोनभद्र की भौगोलिक परिस्थितियां भी इस व्यवस्था को गंभीर बनाती हैं। जिले के कई गांव तहसील मुख्यालय से काफी दूर हैं। ऐसे में गरीब ग्रामीणों के लिए तहसील दिवस में पहुंचना केवल शिकायत दर्ज कराने भर की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि किराया खर्च करने, काम छोड़ने और पूरा दिन लगाने की कीमत भी चुकानी पड़ती है।
ऐसे फरियादी जब लंबी दूरी तय कर अधिकारियों के सामने अपनी समस्या रखते हैं और उन्हें मौके पर समाधान के बजाय संबंधित विभाग को जांच या कार्यवाही के निर्देश की जानकारी देकर वापस भेज दिया जाता है, तो उनके लिए सवाल सिर्फ शिकायत दर्ज होने का नहीं, बल्कि समस्या वास्तव में कब खत्म होगी, इसका होता है।
‘समयबद्ध निस्तारण’ की फाइल में न सिमट जाए फरियाद –
जिलाधिकारी की ओर से गुणवत्तापूर्ण और समयबद्ध निस्तारण के निर्देश दिए गए हैं लेकिन समाधान दिवस की सफलता का वास्तविक पैमाना शिकायतों की संख्या या जारी किए गए निर्देश नहीं, बल्कि फरियादी की समस्या का अंतिम समाधान होना चाहिए। खासकर उन गरीब और दूरदराज के ग्रामीणों के लिए, जो उम्मीद लेकर तहसील पहुंचते हैं, केवल यह कहना कि “मामला संबंधित अधिकारी को भेज दिया गयाहै” समाधान की अंतिम मंजिल नहीं हो सकती।





