आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । जिस सोनभद्र को देश की ऊर्जा राजधानी कहा जाता है, उसी धरती का युवा जब दो वक्त की रोटी के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर दूसरे प्रदेश जाने को मजबूर हो और फिर घर लौटे तो उसके साथ रोजगार नहीं, बल्कि कफन हो तो विकास और रोजगार के दावों पर सवाल उठना लाजिमी है। चोपन थाना क्षेत्र के कोटा ग्राम पंचायत के वसुधा गांव में 19 वर्षीय कमलेश पुत्र परमेश्वर की गुजरात में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने एक बार फिर जिले में रोजगार और पलायन के मुद्दे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। वहीं एंबुलेंस से शव गांव पहुंचा तो ग्रामीणों ने एंबुलेंस रोक दी और मृतक के परिवार को सहायता एवं मुआवजे की मांग को लेकर विरोध शुरू कर दिया।
मृतक के पिता ने बेटे की मौत को बताया संदिग्ध, की जाँच की माँग –
वहीं मृतक के पिता परमेश्वर गोंड ने बताया कि “उनका बेटा कमलेश कुमार गोंड रोजी-रोटी के लिए दुद्धी निवासी ठेकेदार देव नारायण यादव के साथ गुजरात गया था। पिता के मुताबिक वहां पहुंचने के करीब तीन दिन बाद उन्हें बेटे की मौत की जानकारी मिली और बाद में उसका शव आज एंबुलेंस से घर भेजवा दिया गया। परमेश्वर का कहना है कि वह पूरे मामले की जाँच और परिवार के लिए आर्थिक सहायता चाहते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ठेकेदार देवनारायण यादव से फोन के माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन उसका फोन नहीं लग रहा है। उन्होंने उनके बेटे की मौत को संदिग्ध बताया है।”
आखिर जिले के युवाओं को स्थानीय स्तर पर क्यों नहीं मिल पा रहा रोजगार ये बड़ा सवाल –
करीब दो महीने पहले कमलेश रोजी-रोटी की तलाश में गुजरात गया था। वहां उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। गुजरात से एंबुलेंस के जरिए जब उसका शव गांव पहुंचा तो परिजनों और ग्रामीणों का आक्रोश फूट पड़ा। ग्रामीणों ने एंबुलेंस को रोक लिया और मृतक के परिवार को मुआवजा दिलाने की मांग शुरू कर दी। सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची और ग्रामीणों को समझाने का प्रयास किया लेकिन इस घटना ने एक बड़ा और असहज सवाल छोड़ दिया है कि आखिर सोनभद्र के युवाओं को अपने ही जिले में ऐसा रोजगार क्यों नहीं मिल पा रहा, जिसके लिए उन्हें गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली और दूसरे राज्यों का रुख करना पड़े?
राज्य मंत्री के विधानसभा क्षेत्र में पलायन का सवाल –
चोपन क्षेत्र ओबरा विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है। ओबरा के विधायक संजीव कुमार गोंड वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री हैं। ऐसे में उनके विधानसभा क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों से रोजगार की तलाश में युवाओं के बड़े पैमाने पर बाहर जाने की स्थिति स्थानीय रोजगार व्यवस्था और जनप्रतिनिधित्व की प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े करती है। ऐसे में सवाल किसी एक हादसे तक सीमित नहीं है। ऐसे में सवाल उस व्यवस्था का है, जिसमें खनिज, बिजली और उद्योगों के लिए देशभर में पहचान रखने वाला सोनभद्र अपने ही युवाओं को पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं करा पा रहा है। सरकार और प्रशासन की ओर से निवेश, औद्योगिक परियोजनाओं और रोजगार सृजन की घोषणाएं लगातार सामने आती हैं, लेकिन गांव का युवा आज भी रोजगार के लिए दूसरे प्रदेश की ओर देख रहा हएमओयू और निवेश के दावों के बीच जमीन पर क्या बदला?
लगातार साइन हो रहा ओएमयू लेकिन नहीं बदल रहे हालात –
जिले में उद्योगों और निवेश को बढ़ावा देने के लिए एमओयू और रोजगार सृजन की बातें होती रही हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले युवाओं के लिए इन परियोजनाओं का वास्तविक लाभ कितना पहुंचा, यह बड़ा सवाल है। अगर जिले में रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा हो रहे हैं तो चोपन, कोटा और आसपास के गांवों से युवाओं को गुजरात क्यों जाना पड़ रहा है? अगर सरकार की औद्योगिक और निवेश नीतियां रोजगार पैदा कर रही हैं तो उनका लाभ स्थानीय युवाओं तक कब पहुंचेगा?
और सबसे बड़ा सवाल कि क्या जनप्रतिनिधि और जिम्मेदार अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि सोनभद्र का युवा रोजगार के लिए पलायन करने के बजाय अपने ही जिले में सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार हासिल कर सके।






