आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । बेसिक शिक्षा विभाग भले ही परिषदीय विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दावे करता हो, लेकिन आए दिन सामने आ रहे वीडियो इन दावों और कक्षा की हकीकत के बीच की दूरी पर सवाल खड़े कर रहे हैं। पहले बच्चों के किताब न पढ़ पाने का मामला चर्चा में आया और अब कथित वायरल वीडियो में ‘कुत्ता’ के पर्यायवाची के रूप में ‘कलुआ’ और ‘झबरुआ’ बताए जाने की बात सामने आने से शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है।
ताजा मामला खंड शिक्षा क्षेत्र चोपन के कंपोजिट स्कूल झिरगाडंडी से जुड़ा बताया जा रहा है। करीब 43 सेकेंड के कथित वायरल वीडियो में एक शिक्षक बच्चों को हिंदी विषय पढ़ाते नजर आ रहे हैं। वीडियो में ‘कुत्ता’ के पर्यायवाची के तौर पर ‘कलुआ’, ‘शेरूआ’ और ‘झबरुआ’ बताए जाने की बात सामने आ रही है। वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के बाद लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
‘झबरा कुत्ता’ से ‘झबरुआ’ तक पहुंची कक्षा की पढ़ाई –
हिंदी भाषा में ‘झबरा’ शब्द लंबे, घने अथवा बिखरे बाल वाले व्यक्ति या पशु के लिए विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है। आम बोलचाल में ‘झबरा कुत्ता’ कहना अलग बात है, लेकिन किसी विशेषण या स्थानीय संबोधन को सीधे ‘कुत्ता’ का पर्यायवाची बताकर पढ़ाया जाना भाषाई दृष्टि से सवाल खड़े करता है। हिंदी में कुत्ता के प्रचलित पर्यायवाची शब्दों में श्वान, कुक्कुर, शुनक और सारमेय जैसे शब्द शामिल हैं। ऐसे में कथित वीडियो में दिखाई दे रही पढ़ाने की शैली को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है कि बच्चों को मानक पाठ्यक्रम के अनुरूप भाषा-ज्ञान दिया जा रहा है या स्थानीय बोलचाल के शब्दों को ही व्याकरण का हिस्सा बनाकर पढ़ाया जा रहा है।
पहले किताब पढ़ने पर सवाल, अब पर्यायवाची का ‘नया पाठ’ –
मामला इसलिए भी गंभीर नजर आता है क्योंकि कुछ दिन पहले ही कोन क्षेत्र के एक विद्यालय से जुड़ा कथित वीडियो चर्चा में आया था, जिसमें कक्षा सात और आठ के बच्चों को हिंदी की किताब पढ़ने में कठिनाई होने की बात सामने आई थी।
अब चोपन क्षेत्र के विद्यालय से जुड़ा कथित वीडियो सामने आने के बाद सवाल सिर्फ एक कक्षा या एक शिक्षक तक सीमित नहीं रह जाता। सवाल यह भी है कि विद्यालयों में नियमित निरीक्षण के बावजूद कक्षा के अंदर बच्चों को वास्तव में क्या पढ़ाया जा रहा है, इसकी निगरानी कितनी प्रभावी है?
निरीक्षण व्यवस्था पर भी उठे सवाल –
बेसिक शिक्षा विभाग विद्यालयों में शैक्षिक गुणवत्ता सुधारने, शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने और बच्चों के सीखने के स्तर को बेहतर बनाने के लिए लगातार निरीक्षण का दावा करता है। लेकिन यदि वायरल वीडियो में दिखाई दे रही बात जांच में सही साबित होती है तो यह व्यवस्था की निगरानी पर भी सवाल खड़ा करेगी।
क्या विद्यालय निरीक्षण सिर्फ उपस्थिति रजिस्टर, अभिलेख और कागजी व्यवस्थाओं की जांच तक सीमित है? या फिर निरीक्षण के दौरान यह भी देखा जाता है कि कक्षा में शिक्षक बच्चों को क्या और किस तरीके से पढ़ा रहे हैं? यही सवाल अब अभिभावकों और शिक्षा से जुड़े लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
एबीएसए बोले- जायज नहीं ऐसी पढ़ाई
मामले को लेकर एबीएसए लोकेश मिश्रा ने कहा कि “इस तरह की पढ़ाई जायज नहीं है। उन्होंने मामले की जांच कराने और जांच के आधार पर आवश्यक कार्यवाही किए जाने की बात कही है।”
वायरल वीडियो ने बढ़ाई विभाग की चुनौती –
बेसिक शिक्षा विभाग के सामने अब चुनौती सिर्फ वायरल वीडियो की जांच तक सीमित नहीं है। जरूरत इस बात की भी है कि विद्यालयों में वास्तविक शिक्षण व्यवस्था की प्रभावी निगरानी हो और बच्चों को पाठ्यक्रम के अनुरूप मानक एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले।
“बहरहाल वायरल वीडियो की सत्यता और उसमें दिखाई दे रहे शिक्षण की वास्तविकता जांच के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी, लेकिन यदि कथित तौर पर बच्चों को मानक पर्यायवाची के स्थान पर स्थानीय बोलचाल के शब्द पढ़ाए जाने की पुष्टि होती है तो मामला महज एक शिक्षक की चूक तक सीमित नहीं रहेगा। यह सीधे उस निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करेगा, जिसके भरोसे विद्यालयों में ‘गुणवत्तापूर्ण शिक्षा’ सुनिश्चित करने का दावा किया जा रहा है। बच्चों की बुनियादी भाषा-ज्ञान की नींव कक्षा में ही तैयार होती है, ऐसे में गलत या अमानक जानकारी की गुंजाइश भविष्य की पढ़ाई पर भी असर डाल सकती है। अब जरूरत सिर्फ जांच कर जिम्मेदारी तय करने की नहीं, बल्कि विद्यालयों की कक्षाओं तक निगरानी पहुंचाने की है, ताकि शिक्षा की गुणवत्ता रजिस्टर और रिपोर्ट में नहीं, बच्चों की पढ़ाई में दिखाई दे।”





