आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । बारिश का मौसम बीत चुका है और इसके साथ ही संचारी रोगों के खिलाफ सरकारी अभियान का एक और दौर शुरू हो गया है। हर तीन माह में अभियान, जागरूकता के दावे और विभागीय निर्देशों के बावजूद यदि बरसात के बाद भी जलजमाव, गंदगी और मच्छरों के प्रजनन स्थल चुनौती बने हुए हैं तो सवाल अभियान की मंशा पर नहीं, उसकी जमीनी कार्यशैली और असर पर उठना स्वाभाविक है। एक अक्टूबर से शुरू हुए विशेष संचारी रोग नियंत्रण अभियान का शुभारंभ जिलाधिकारी चर्चित गौड़ ने मारकुंडी से किया और स्वयं गांव की गलियों में पैदल पहुंचकर ग्रामीणों से संवाद किया। अब असली परीक्षा यह है कि 31 अक्टूबर तक यह अभियान कागजी रिपोर्टों और जागरूकता कार्यक्रमों से आगे निकलकर गांवों की धरातलीय तस्वीर कितनी बदल पाता है।
जिलाधिकारी ने किया कार्यक्रम का शुभारंभ –
अभियान का शुभारंभ जिलाधिकारी चर्चित गौड़ ने ग्राम मारकुंडी से किया। खास बात यह रही कि जिलाधिकारी औपचारिक शुभारंभ कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहे, बल्कि स्वयं गांव की गलियों में पैदल पहुंचे और ग्रामीणों से सीधा संवाद किया। उन्होंने घरों के आसपास पानी का ठहराव नहीं होने देने और नियमित साफ-सफाई रखने की अपील की।
बीमारी से बचाव के लिए जागरूकता जरूरी – डीएम
जिलाधिकारी चर्चित गौड़ ने कहा कि “डेंगू, मलेरिया सहित मच्छरजनित एवं जलजनित रोगों की रोकथाम के लिए घर और आसपास के क्षेत्र की स्वच्छता बेहद जरूरी है। ग्रामीण घरों के आसपास पानी जमा न होने दें और नियमित रूप से साफ-सफाई रखें। उन्होंने कहा कि बुखार अथवा बीमारी के अन्य लक्षण दिखाई देने पर स्वयं दवा लेने के बजाय तत्काल नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जांच एवं उपचार कराया जाए।
डीएम ने अभियान से जुड़े सभी विभागों को आपसी समन्वय के साथ अभियान को प्रभावी एवं परिणामपरक ढंग से संचालित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि संचारी रोगों की रोकथाम केवल विभागीय प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि इसमें आमजन की सहभागिता भी महत्वपूर्ण है। ग्रामीण क्षेत्रों में साफ-सफाई, जलजमाव की रोकथाम और जन-जागरूकता से जुड़ी गतिविधियों को प्राथमिकता देने के निर्देश भी दिए।”
हर तीन माह में अभियान, फिर भी वही सवाल –
संचारी रोगों की रोकथाम के लिए अभियान कोई नई कवायद नहीं है। समय-समय पर अभियान चलाकर लोगों को जागरूक किया जाता है। विभागीय स्तर पर साफ-सफाई, जलजमाव की रोकथाम और संभावित मरीजों की पहचान के दावे भी किए जाते हैं। इसके बावजूद मानसून आते ही कई इलाकों में जलजमाव और मच्छरों की समस्या फिर चुनौती बनकर सामने आती है।
ऐसे में सवाल यह है कि हर अभियान के बाद जमीनी स्तर पर कितना स्थायी बदलाव आता है? क्या अभियान के दौरान चिन्हित जलजमाव वाले स्थानों की नियमित निगरानी होती है? क्या मच्छरों के प्रजनन स्थलों को वास्तव में समाप्त किया जाता है? और क्या अभियान खत्म होने के बाद भी यही निगरानी व्यवस्था जारी रहती है?
मानसून के बाद शुरू हुए अभियान की होगी असली परीक्षा –
1 से 31 अक्टूबर तक चलने वाले इस अभियान में स्वास्थ्य विभाग के साथ अन्य संबंधित विभागों की टीमें गांव-गांव पहुंचकर डेंगू, मलेरिया सहित वेक्टर जनित एवं जलजनित रोगों से बचाव के प्रति लोगों को जागरूक करेंगी। उच्च जोखिम वाले गांवों में विशेष रूप से जन-जागरूकता, साफ-सफाई और जलजमाव की रोकथाम से जुड़ी गतिविधियां संचालित की जाएंगी लेकिन अक्टूबर में अभियान शुरू होने के कारण इसकी सफलता की कसौटी और महत्वपूर्ण हो जाती है। बरसात के बाद बचे जलजमाव और मच्छरों के प्रजनन स्थलों पर यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई होती है, तभी अभियान का वास्तविक असर दिखाई देगा।
12 अक्टूबर से दस्तक, घर-घर होगी संभावित मरीजों की तलाश –
12 अक्टूबर से दस्तक अभियान शुरू होगा। आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता घर-घर जाकर बुखार, कुष्ठ, क्षय रोग, फाइलेरिया और आईएलआई के संभावित मरीजों की पहचान करेंगी। संभावित मरीजों की सूची तैयार कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। साथ ही आभा आईडी के सृजन की प्रक्रिया भी होगीअब इस अभियान की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने घरों में दस्तक दी गई, बल्कि यह भी देखना होगा कि कितने संभावित मरीज मिले, कितनों की जांच हुई और कितनों को समय पर उपचार मिला।
कागजी आंकड़ों से आगे बढ़ने की जरूरत –
सरकारी अभियानों में बैठकों, जागरूकता कार्यक्रमों और रिपोर्टों का अपना महत्व है, लेकिन संचारी रोग नियंत्रण की वास्तविक तस्वीर गांव की गलियों में दिखाई देती है। साफ नालियां, जलजमाव से मुक्त क्षेत्र, मच्छरों के प्रजनन स्थलों पर प्रभावी नियंत्रण और बीमारी की स्थिति में समय पर जांच एवं उपचार ही अभियान की वास्तविक सफलता का पैमाना बन सकते हैं।






