अधिकमास 2026: 84 लाख योनियों से मुक्ति की कामना के साथ शुरू हुई पंचक्रोशी यात्रा, मणिकर्णिका कुंड पर संकल्प लेकर नंगे पांव निकले 25 हजार श्रद्धालु

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वाराणसी: भगवान विष्णु को समर्पित पवित्र अधिकमास के प्रारंभ होते ही धर्मनगरी काशी में अगाध आस्था और भक्ति का अनूठा सैलाब उमड़ पड़ा है। 84 लाख योनियों से मुक्ति और मोक्ष की कामना लिए सनातन धर्मावलंबियों की सुप्रसिद्ध पंचक्रोशी यात्रा रविवार से विधि-विधान के साथ आरंभ हो गई। देवाधिदेव महादेव बाबा विश्वनाथ के भव्य दर्शन-पूजन के बाद देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं ने मणिकर्णिका कुंड पर पारंपरिक संकल्प लिया। इसके तुरंत बाद अटूट श्रद्धा और भक्ति भाव से ओतप्रोत होकर करीब 25 हजार श्रद्धालु नंगे पांव 84 किलोमीटर लंबे परिक्रमा पथ पर आगे बढ़ चले। इस दौरान गगनभेदी भजन-कीर्तन और ‘हर-हर महादेव’ के गूंजते जयघोष से मणिकर्णिका क्षेत्र की तंग गलियां और गंगा घाट पूरी तरह गुंजायमान हो उठे।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धालु इस कठिन पंचक्रोशी यात्रा को पांच दिनों में परिक्रमा पथ पर स्थित पांचों मुख्य पड़ावों पर विश्राम करते हुए पूरी करेंगे। यात्रा के पहले दिन भीषण गर्मी और चिलचिलाती तेज धूप के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था प्रशासनिक व्यवस्थाओं और मौसम की दुश्वारियों पर भारी दिखाई दी। शास्त्रों में अधिकमास यानी मलमास के दौरान गंगा स्नान, दान-पुण्य और तीर्थ यात्रा का विशेष एवं अनंत फलदायी महत्व माना गया है। यही कारण है कि मणिकर्णिका घाट पर शनिवार की रात से ही परिक्रमार्थियों की भारी भीड़ जुटने लगी थी। रविवार भोर की पहली किरण के साथ ही गंगा और मणिकर्णिका कुंड में डुबकी लगाने के बाद, तीर्थ पुरोहितों से रक्षा-सूत्र बंधवाकर और विधिवत संकल्प लेकर श्रद्धालुओं ने जयकारों के बीच अपनी यात्रा की शुरुआत की।

सड़क पर 20, 50 और 100-100 लोगों के छोटे-बड़े जत्थे कतारबद्ध होकर परिक्रमा पथ पर निरंतर आगे बढ़ते हुए दिखाई दिए, जिनमें पुरुषों की तुलना में महिला श्रद्धालुओं की संख्या काफी अधिक रही। सभी श्रद्धालु घाटों के रास्ते होते हुए सबसे पहले अस्सी पहुंचे और वहां से नगवां व लंका के मुख्य मार्गों से गुजरते हुए कंदवा स्थित प्रथम पड़ाव पर पहुंचे। नंगे पैर चलने के कारण दोपहर की तपती सड़क पर श्रद्धालुओं के पैर झुलस रहे थे, लेकिन कांधे पर झोला लिए और शिव भजनों में रमे हुए वे बिना रुके आगे बढ़ते रहे। परिक्रमार्थियों की सेवा के लिए स्थानीय समाजसेवी मोहन मिश्रा द्वारा जगह-जगह शीतल पेयजल और गुड़ की उत्तम व्यवस्था की गई थी। प्रथम पड़ाव पर पहुंचकर सभी श्रद्धालुओं ने कर्दमेश्वर महादेव का दर्शन-पूजन किया और रात्रि विश्राम किया।

सोमवार की सुबह होते ही कंदवा में स्नान और दर्शन-पूजन की प्रक्रिया पूरी कर श्रद्धालुओं का यह विशाल कारवां अगले पड़ाव भीमचंडी के लिए रवाना हो गया। इसके बाद क्रमशः रामेश्वर, पांचों पांडवा और अंतिम पड़ाव कपिलधारा होते हुए पांचवें दिन सभी श्रद्धालु पुनः मणिकर्णिका घाट पहुंचेंगे और वहां बाबा के दरबार में अपनी यात्रा का संकल्प पूर्ण करेंगे। पौराणिक परंपराओं और वर्तमान व्यवस्थाओं पर प्रकाश डालते हुए मंगला गौरी मंदिर के महंत नारायण गुरु ने बताया कि प्राचीन और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मूल रूप से ज्ञानवापी कूप से संकल्प लेने का विधान शास्त्र सम्मत है, परंतु वर्तमान समय में वहां सुरक्षा और कतिपय प्रतिबंधों के कारण आम श्रद्धालु सीधे नहीं जा पाते हैं, इसीलिए अब मणिकर्णिका कुंड पर ही सामूहिक रूप से संकल्प लेने की सुदृढ़ परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है।

Vinod Garg
Author: Vinod Garg

3 years experience in the field of journalism.

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