आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । दीपावली की आहट के साथ ही जिले में कुम्हारों के घरों में चाक की रफ्तार बढ़ गई है। कहीं मिट्टी को आकार देकर दीये तैयार किए जा रहे हैं तो कहीं कलश, ढक्कन और कुल्हड़ बनाने में परिवार के सभी सदस्य जुटे हैं। त्योहार नजदीक आते ही कुम्हारों की उम्मीदें भी परवान चढ़ने लगी हैं। उन्हें आस है कि इस बार लोग बिजली की चकाचौंध और चाइनीज सजावटी सामानों के बजाय मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता देंगे। हालांकि बदलते दौर में परंपरागत कारोबार को बचाए रखना उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।
दीपावली और मिट्टी के दीयों का रिश्ता सदियों पुराना है। घरों की चौखट, आंगन, छत और बालकनी में कतारबद्ध जलते दीये भारतीय संस्कृति और परंपरा की पहचान रहे हैं। लेकिन वक्त के साथ बिजली की झालरों और रंग-बिरंगी लाइटों ने मिट्टी के दीयों की जगह काफी हद तक ले ली है। इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ा है, जिनकी पीढ़ियां मिट्टी को आकार देकर अपनी आजीविका चलाती आई हैं। इसके बावजूद दीपावली और छठ जैसे पर्व कुम्हारों के पुश्तैनी कारोबार को नई उम्मीद देते हैं।
कुम्हार परिवार के युवा मिट्टी में तलाश रहे भविष्य –
जनपद मुख्यालय स्थित सजौर गांव सहित रॉबर्ट्सगंज के जोगिया मोहाल में कुम्हार परिवार दीपावली की तैयारियों में दिन-रात जुटे हैं। सुबह से शाम तक चाक घूमता है और मिट्टी से दीये, कलश व पूजा में इस्तेमाल होने वाले दूसरे सामान तैयार किए जा रहे हैं। इन परिवारों के लिए यह महज पारंपरिक कला नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का जरिया है। घर के पुरुष मिट्टी को आकार देने और सामान पकाने में जुटे हैं तो महिलाएं दीयों पर नक्काशी, रंगाई और सजावट का काम संभाल रही हैं। बच्चे भी सूखे हुए दीयों और बर्तनों को सहेजने में हाथ बंटा रहे हैं।
इलेक्ट्रॉनिक चाक से मिली राहत, लेकिन मिट्टी की किल्लत बरकरार –
रॉबर्ट्सगंज के वार्ड नंबर-10 जोगिया मोहाल निवासी शंभू प्रजापति बताते हैं कि “उनके पूर्वज भी मिट्टी के बर्तन बनाकर परिवार का भरण-पोषण करते थे। आज नई पीढ़ी भी उसी परंपरा को आगे बढ़ा रही है। दीपावली और छठ के लिए दीये, कलश और ढक्कन तैयार किए जाते हैं, जबकि शादी-विवाह के अवसरों पर कुल्हड़ की मांग रहती है।”
सुखदेव प्रजापति के मुताबिक, “पारंपरिक सीमेंट के चाक पर काम करना काफी मेहनत भरा होता है। भारी चाक को लगातार हाथ से घुमाना पड़ता है। शासन की ओर से मिले इलेक्ट्रॉनिक चाक ने काम कुछ आसान जरूर किया है। अब कम समय और कम मेहनत में पहले की अपेक्षा अधिक सामान तैयार हो जाता है।”
वहीं युवा कुम्हार अमित प्रजापति का कहना है कि “कारोबार के सामने सबसे बड़ी समस्याओं में चिकनी मिट्टी की उपलब्धता भी शामिल है। दीये और दूसरे मिट्टी के उत्पाद बनाने के लिए खास किस्म की मिट्टी चाहिए, जिसे कई बार पैसे देकर खरीदना पड़ता है। इसके अलावा तैयार सामान को सुखाने के लिए पर्याप्त धूप जरूरी है, लेकिन बेमौसम बारिश ने इस बार मुश्किलें बढ़ा दी हैं। बारिश के चलते दीये और कलश समय पर सूख नहीं पा रहे हैं, जिससे उत्पादन प्रभावित हो रहा है।”
खपड़ैल के कारोबार पर आधुनिकता की चोट से सिमटा पुश्तैनी हुनर –
एक दौर था जब रॉबर्ट्सगंज और आसपास के गांवों में मिट्टी के खपड़ैल वाले मकान आम हुआ करते थे। गर्मी के दिनों में इन घरों के भीतर अपेक्षाकृत ठंडक रहती थी। कुम्हार परिवार खपड़ैल बनाकर भी अच्छी आजीविका चलाते थे, लेकिन पक्के मकानों और सीमेंट की चादरों का चलन बढ़ने के साथ यह कारोबार लगभग खत्म हो गया। आज गांवों में कहीं-कहीं बचे पुराने खपड़ैल वाले मकान ही इस परंपरा की याद दिलाते हैं। अब कुम्हारों का कारोबार मुख्य रूप से दीये, कलश, कुल्हड़ और छोटी घरेलू वस्तुओं तक सिमट गया है।
महिलाओं के हाथों से संवरते हैं मिट्टी के दीये –
मधु देवी बताती हैं कि “परिवार की महिलाएं दीयों पर नक्काशी और उन्हें सजाने का काम करती हैं। बच्चे सूखे हुए दीयों और बर्तनों को संभालकर एक जगह एकत्रित करते हैं। घर का हर सदस्य अपनी जिम्मेदारी निभाता है। दोपहर के समय महिलाएं तीन से चार घंटे तक इस काम में जुटी रहती हैं। घरेलू जिम्मेदारियों के बीच यह काम करना आसान नहीं होता, लेकिन परिवार की आमदनी के लिए सभी को मेहनत करनी पड़ती है।”
पुष्पा देवी को उम्मीद, इस बार घर-घर जलेगा मिट्टी का दीया –
वहीं पुष्पा देवी का कहना है कि “दीपावली का त्योहार उनके परिवार के लिए सिर्फ खुशियों का पर्व नहीं, बल्कि सालभर की मेहनत का परिणाम मिलने का समय भी होता है। मिट्टी के दीये तैयार करने में कई दिनों की मेहनत लगती है। पहले मिट्टी जुटाना, फिर उसे गूंथना, चाक पर दीये बनाना, सुखाना और पकाना पड़ता है। इसके बाद ही दीये बाजार तक पहुंच पाते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस बार लोग स्वदेशी परंपरा को अपनाते हुए मिट्टी के दीये अधिक खरीदेंगे, ताकि कुम्हार परिवारों की मेहनत का उचित मूल्य मिल सके। उनका कहना है कि यदि लोग त्योहारों पर मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता दें तो पुश्तैनी कारोबार को नई जिंदगी मिल सकती है।”
Author: Anand Kumar Chaubey
9 years experience in Journalism....





