आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । जनपद की शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए विकास भवन में सीडीओ जागृति अवस्थी के निर्देशन में शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों की बैठक में एक बार फिर दिशा-निर्देशों की लंबी फेहरिस्त सामने आई। विद्यालयों में शिक्षकों की उपस्थिति से लेकर निरीक्षण, डिजिटल मॉनिटरिंग, नामांकन, आधारभूत सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक की समीक्षा हुई। आंकड़ों में तस्वीर भी काफी बेहतर नजर आई, लेकिन हाल ही में सामने आए दो वायरल वीडियो ने इन दावों के सामने जमीनी शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक ओर जिला स्तरीय शिक्षा समीक्षा बैठक में 2,061 विद्यालयों में ऑपरेशन कायाकल्प के 19 मानकों पर 94.30 प्रतिशत इंफ्रास्ट्रक्चर सैचुरेशन का आंकड़ा सामने रखा गया, वहीं दूसरी ओर वायरल वीडियो में कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों की शैक्षणिक स्थिति ने व्यवस्था की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कक्षा 7-8 के बच्चों को हिंदी की किताब नहीं आया पढ़ना –
हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो में निरीक्षण के दौरान कक्षा 7 और 8 के बच्चों से हिंदी की किताब पढ़ने को कहा गया, लेकिन बच्चे किताब पढ़ने में असमर्थ नजर आए। यदि वीडियो में दिखाई गई स्थिति वास्तविक है तो यह महज किसी एक छात्र की कमजोरी का मामला नहीं, बल्कि विद्यालय में बुनियादी शैक्षणिक दक्षताओं और नियमित शैक्षणिक अनुश्रवण पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
दूसरे वायरल वीडियो में बच्चों को ‘कुत्ते’ के पर्यायवाची शब्दों के रूप में ‘कलुआ, झबरुआ, शेरू’ आदि पढ़ाए जाने का मामला सामने आया। वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना, लेकिन इन दोनों मामलों में विभागीय स्तर पर अब तक कोई स्पष्ट कार्यवाही या जांच की जानकारी सार्वजनिक न होने से सवाल और गंभीर हो गए हैं।
बैठक में जवाबदेही के निर्देश, जमीन पर कार्यवाही पर सवाल –
जिला स्तरीय बैठक में अनधिकृत अनुपस्थिति के 45 मामलों में कार्यवाही किए जाने का दावा किया गया। सितंबर में ब्लॉक टास्क फोर्स के 750 के लक्ष्य के सापेक्ष 725 निरीक्षण और जिला टास्क फोर्स के 215 के लक्ष्य के सापेक्ष 144 निरीक्षण की भी समीक्षा हुई। लेकिन इन निरीक्षणों में क्या कमियां सामने आई और उन कमियों पर क्या कार्यवाही अमल में लाई गई वह भी स्पष्ट नहीं होना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। वहीं 1,336 विद्यालयों में डिजिटल रजिस्टर के उपयोग का आंकड़ा भी सामने आया लेकिन सवाल यह है कि यदि विद्यालयों का नियमित निरीक्षण हो रहा है और निरीक्षण व्यवस्था प्रभावी है तो फिर बच्चों की बुनियादी पढ़ने की क्षमता और कक्षा में दी जा रही शिक्षा की गुणवत्ता पर निगरानी क्यों नहीं दिख रही? केवल निरीक्षण की संख्या बढ़ाने और पोर्टल पर आंकड़े अपडेट करने से शिक्षा की वास्तविक गुणवत्ता कैसे सुनिश्चित होगी, यह भी विचारणीय ह
वायरल वीडियो पर कार्यवाही न होना भी बना सवाल –
शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए बैठकों में लगातार निर्देश जारी किए जा रहे हैं। लेकिन वायरल वीडियो में दिखाई गई कथित शैक्षणिक कमियों पर यदि विभाग जांच तक नहीं करता है तो इससे विभाग की निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। वायरल वीडियो सही हैं या उनमें किसी प्रकार का संदर्भगत अंतर है, यह जांच का विषय है, लेकिन उनकी सत्यता की जांच कर जिम्मेदारी तय करना विभाग की जवाबदेही का हिस्सा होना चाहिए।
बहरहाल एक तरफ बैठकों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, डिजिटल मॉनिटरिंग और प्रभावी अनुश्रवण के आंकड़े पेश किए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ वायरल वीडियो में बच्चों की बुनियादी शैक्षणिक क्षमता और कक्षा में पढ़ाए जा रहे विषय को लेकर सामने आई तस्वीर इन दावों के बीच बड़ा विरोधाभास पैदा करती है। ऐसे में अब बड़ा सवाल यह है कि बेसिक शिक्षा विभाग आंकड़ों और बैठकों से आगे निकलकर स्कूलों की वास्तविक कक्षाओं तक कब पहुंचेगा? बच्चों को किताब पढ़ना और सही शिक्षा देना ही यदि व्यवस्था की पहली कसौटी है, तो वायरल वीडियो में उठे सवालों की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय किए बिना शिक्षा सुधार के दावों को जमीन पर कैसे परखा जाएगा?






