मानवेंद्र मिश्रा, लखनऊ: उत्तर प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों और निजी अस्पतालों में दवाओं और मेडिकल उपकरणों के नाम पर मरीजों से बेतहाशा वसूली का सनसनीखेज मामला सामने आया है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) द्वारा प्रदेश भर के 214 फार्मेसियों की गहन जांच में खुलासा हुआ है कि कई जीवनरक्षक दवाओं की अधिकतम खुदरा बिक्री दर (एमआरपी) उनकी मूल खरीद कीमत से 10 गुना से लेकर 67 गुना तक अधिक रखी गई है। जांच के तहत 130 प्रमुख दवाओं का विश्लेषण किया गया, जिनमें गंभीर संक्रमण, आईसीयू और कैंसर जैसी जटिल बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली इंजेक्टेबल दवाओं के दामों में सबसे बड़ा अंतर देखा गया। उदाहरण के तौर पर, बैक्टीरियल संक्रमण के इलाज में काम आने वाले पॉलीमाइक्सिन-बी इंजेक्शन की वास्तविक खरीद दर महज ₹74.09 है, जिसे मरीजों को ₹4980.94 की भारी-भरकम एमआरपी पर बेचा जा रहा है। इसी प्रकार, लिवर की बीमारी का एक इंजेक्शन ₹56 में खरीदकर ₹3050 में तथा फंगल इंफेक्शन का ₹800 का इंजेक्शन ₹21,230 में बेचा जा रहा है।
जांच में केवल दवाएं ही नहीं, बल्कि सर्जिकल और मेडिकल उपकरणों के दामों में भी भारी मुनाफाखोरी पाई गई है। 3-वे स्टॉप कॉक उपकरण की खरीद दर ₹6.40 के मुकाबले एमआरपी ₹163 (25 गुना अधिक) और ₹20.95 का उपकरण ₹500 में दर्ज मिला। एफएसडीए के अधिकारियों के अनुसार, अस्पतालों और फार्मेसियों द्वारा बड़ा ट्रेड मार्जिन और डिस्काउंट का खेल रचने के लिए जानबूझकर एमआरपी को अप्रत्याशित रूप से ऊंचा रखा जाता है। इसके अलावा, निजी अस्पताल अक्सर ‘मोनोपॉली ब्रांड्स’ का सहारा लेते हैं—यानी ऐसी खास दवाएं जो खुले बाजार या आम मेडिकल स्टोरों पर उपलब्ध ही नहीं होतीं। मजबूरी में मरीजों के तीमारदारों को अस्पताल के भीतर से ही मनमाने दामों पर दवाएं खरीदनी पड़ती हैं, जिससे इलाज का बजट कई गुना बढ़ जाता है और मरीजों की जेब पर सीधा डाका पड़ता है।
Author: NAV HIND SAMACHAR
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