Sonbhadra News : यमदूत बने निजी अस्पताल! प्रसूता की मौत के बाद कथित सुलह-समझौते की चर्चा, स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल

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आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)

सोनभद्र । जिले में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के दावों के बीच निजी अस्पतालों में मरीजों की मौत और उपचार में कथित लापरवाही के मामले लगातार सवाल खड़े कर रहे हैं। रॉबर्ट्सगंज के धर्मशाला स्थित एक निजी अस्पताल में प्रसव के बाद एक और प्रसूता की हालत बिगड़ने, दूसरे निजी अस्पताल और फिर वाराणसी रेफर किए जाने के दौरान मौत हो गई। महिला की मौत के बाद परिजनों ने अस्पताल पहुंचकर नाराजगी जताई। कई घंटे की बातचीत के बाद मामले के कथित तौर पर सुलह-समझौते में समाप्त होने की चर्चा है लेकिन इस घटना ने सिर्फ एक प्रसूता की मौत का सवाल नहीं खड़ा किया है, बल्कि पूरे जिले की रेफरल व्यवस्था, निजी अस्पतालों की भूमिका और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। सवाल यह भी है कि जब सोनभद्र में मेडिकल कॉलेज संचालित है और 100 बेड का मातृ-शिशु विंग भी उपलब्ध है, तो आखिर गरीब और जरूरतमंद मरीज निजी अस्पतालों तक कैसे पहुंच रहे हैं? क्या मरीजों को सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की सुविधाओं की जानकारी नहीं मिल पा रही या उन्हें निजी अस्पतालों की ओर भेजने के पीछे कोई ऐसा नेटवर्क सक्रिय है, जिसकी कभी गंभीरता से जांच ही नहीं हुई?

सामान्य प्रसव के बाद बिगड़ी हालत –

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, रॉबर्ट्सगंज थाना क्षेत्र के बरवन गांव निवासी प्रसूता को मंगलवार की सुबह प्रसव पीड़ा होने पर परिजन धर्मशाला स्थित एक निजी अस्पताल लेकर पहुंचे थे। अस्पताल में महिला का सामान्य प्रसव कराया गया। प्रसव के बाद महिला को अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा और उसकी हालत बिगड़ती चली गईस्थिति गंभीर होने पर अस्पताल की ओर से महिला को उरमौरा स्थित दूसरे निजी अस्पताल रेफर किए जाने की बात सामने आई। वहां उपचार के बावजूद हालत में सुधार नहीं होने पर मंगलवार की देर रात उसे वाराणसी के लिए रेफर कर दिया गया। परिजन महिला को लेकर वाराणसी जा रहे थे, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई। इसके बाद परिजन शव लेकर घर चले गए। बुधवार की सुबह वे धर्मशाला स्थित निजी अस्पताल पहुंचे और इलाज को लेकर नाराजगी जताते हुए हंगामा शुरू कर दिया।

घंटों चली बातचीत, समझौते की चर्चा –

अस्पताल पहुंचने के बाद परिजनों और अस्पताल संचालकों के बीच काफी देर तक बातचीत हुई। चर्चाओं के मुताबिक कई घंटे चली बातचीत के बाद मामला कथित तौर पर सुलह-समझौते से समाप्त हो गया। इसके बाद परिजनों ने किसी प्रकार की विधिक कार्यवाही नहीं की और महिला का अंतिम संस्कार कर दिया।
हालांकि, महिला की मौत का वास्तविक चिकित्सकीय कारण क्या था, प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव की स्थिति में अस्पताल में किस प्रकार की आपातकालीन व्यवस्था उपलब्ध थी और उपचार के दौरान निर्धारित चिकित्सकीय प्रोटोकॉल का पालन हुआ या नहीं—इन सवालों का आधिकारिक जवाब अभी सामने नहीं आया है।

इसी अस्पताल में पहले भी हुई थी प्रसूता की मौत जबकि दूसरे अस्पताल में भी एक मरीज की हुई थी मौत –

मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि चर्चाओं के अनुसार कुछ समय पूर्व धर्मशाला स्थित इसी निजी अस्पताल में एक अन्य प्रसूता की भी मौत हुई थी। उस घटना के बाद परिजनों ने अस्पताल में जमकर वार हंगामा किया था। परिजनों की तहरीर पर मुकदमा भी दर्ज किया गया था। यहीं नहीं रेफर किए गएू दूसरे हॉस्पिटल में भी मंगलवार को ही एक अन्य महिला मरीज की मौत हुई थी, जिसको लेकर उस महिला मरीज के परिजन उसी अस्पताल परिसर में हंगामा कर रहे थे।

अब उसी अस्पताल में एक बार फिर प्रसूता की मौत की घटना सामने आने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि पिछली घटनाओं के बाद स्वास्थ्य विभाग ने अस्पताल की व्यवस्थाओं और चिकित्सकीय मानकों की जांच किस स्तर तक की? यदि जांच हुई तो उसकी रिपोर्ट क्या रही और कार्यवाही क्यों नहीं दिखाई दी?

“बहरहाल सवाल अब सिर्फ एक प्रसूता की मौत का नहीं है बल्कि सवाल उस पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था का है, जहां इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचने वाला गरीब और ग्रामीण मरीज आखिरकार सुरक्षित इलाज के बजाय मौत की चौखट तक कैसे पहुंच जाता है। आदिवासी बाहुल्य सोनभद्र में मेडिकल कॉलेज, सरकारी अस्पतालों और मातृ-शिशु स्वास्थ्य सुविधाओं की मौजूदगी के बावजूद यदि मरीज निजी अस्पतालों का रुख करने को मजबूर हैं, तो इसकी वजहों की तह तक जाना स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है। क्या सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की कमी, मरीजों के साथ व्यवहार, व्यवस्थागत खामियां या भरोसे का संकट उन्हें निजी अस्पतालों की ओर धकेल रहा है? क्या सरकारी संस्थानों से निजी अस्पतालों तक मरीजों के पहुंचने के पीछे कोई अनौपचारिक रेफरल व्यवस्था काम कर रही है? क्या कहीं बिचौलियों का नेटवर्क सक्रिय है? और यदि कमीशन के लिए मरीजों को निजी अस्पतालों तक पहुंचाने की शिकायतें हैं, तो उसकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होती?
इन सवालों का जवाब महज कागजी कार्यवाही, खानापूर्ति या किसी आपसी समझौते से नहीं मिल सकता। इसके लिए पारदर्शी जांच, जिम्मेदारी तय करने और दोषी पाए जाने पर कार्यवाही की जरूरत है क्योंकि जब बेहतर इलाज की आस लेकर अस्पताल की दहलीज पर पहुंचा एक गरीब मरीज इलाज के बाद स्वस्थ होकर घर लौटने के बजाय कफन में घर पहुंचता है, तो यह सिर्फ एक परिवार की निजी त्रासदी नहीं रह जाती। यह उस व्यवस्था के सामने खड़ा वह कठोर सवाल बन जाता है, जिसका जवाब स्वास्थ्य विभाग को देना ही होगा। आखिर मरीज की जान की कीमत क्या है? और यदि निजी अस्पतालों की निगरानी के लिए पूरा तंत्र मौजूद है, तो बार-बार उठती शिकायतों और मौतों के बावजूद कार्यवाही कहां है? ऐसे में अब जरूरत सिर्फ घटना पर पर्दा डालने की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की परतें खोलने की है, जिसके बीच मरीज, मुनाफा और चिकित्सा व्यवस्था के सवाल उलझते जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग को तय करना होगा कि वह इन घटनाओं को महज आंकड़ों में दर्ज करेगा या मरीजों की जिंदगी की हिफाजत के लिए जवाबदेही भी तय करेगा।”

 

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