आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का पर्व पितृपक्ष शनिवार से प्रारंभ हो गया। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले इस विशेष काल में जिले भर के सनातन धर्मावलंबी अपने पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करेंगे। मंदिरों, घाटों और घरों में धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम शुरू हो गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने का सबसे महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। इस अवधि में लोग संयमित जीवनशैली अपनाते हुए खान-पान, आचरण और व्यवहार में विशेष सावधानी बरतते हैं तथा अपने दिवंगत माता-पिता और पूर्वजों का विधि-विधान से श्राद्ध करते हैं।
विद्वान पं0 शिव कुमार मिश्रा ‘शास्त्री’ ने बताया कि “भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक पितृपक्ष की अवधि रहती है। शास्त्रों में पितरों को देवतुल्य माना गया है और श्राद्ध कर्म के माध्यम से उनकी आत्मा की शांति तथा परिवार पर आशीर्वाद की कामना की जाती है। उन्होंने बताया कि जिस तिथि पर पूर्वज का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर उनके नाम से तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करने की परंपरा है। यदि मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध किया जाता है।”
धार्मिक मान्यता है कि पितरों को जल अर्पित करने और विधिपूर्वक श्राद्ध करने से वे तृप्त होते हैं। पितृपक्ष में कौवे को पितरों का प्रतीक मानकर भोजन कराने की परंपरा भी प्रचलित है। मान्यता है कि पितरों की प्रसन्नता से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।






