आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । विकास परियोजना के लिए अपना घर, खेत और पुश्तैनी जमीन गंवाने वाले कजियारी के ग्रामीणों के जख्म वर्षों बाद भी नहीं भर सके हैं। नगवां डैम में घर और कृषि भूमि डूबने के बाद पुनर्वास का भरोसा पाने वाले कई परिवार आज भी स्थायी आशियाने और खेती की जमीन के लिए सरकारी दफ्तरों की चौखट नापने को मजबूर हैं। सोमवार को दर्जनों महिला-पुरुष इसी पीड़ा को लेकर कलक्ट्रेट पहुंचे और जिलाधिकारी चर्चित गौड़ से घर के बदले घर और जमीन के बदले जमीन की मांग रखी। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि मांग का समाधान नहीं हुआ तो 15 अक्टूबर से कलक्ट्रेट परिसर में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया जाएगा।
डैम में डूबा घर लेकिन खत्म नहीं हुआ विस्थापन का दर्द –
नगवां डैम के जलभराव के दौरान कजियारी गांव के कई परिवारों के घर और खेत पानी में समा गए। विकास की परियोजना के लिए ग्रामीणों ने अपनी जमीन छोड़ी, लेकिन वर्षों बाद भी पुनर्वास की तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हो सकी है। कुछ परिवारों को आवास और कृषि भूमि मिली, जबकि कई परिवार आज भी स्थायी व्यवस्था के इंतजार में हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि उनके घर और खेत सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं थे, बल्कि उनकी पीढ़ियों की पहचान और आजीविका का आधार थे। उन्हें उजाड़कर विकास तो किया गया, लेकिन विस्थापन के बाद उनके जीवन को स्थिर करने की जिम्मेदारी अब भी अधूरी दिखाई दे रही है।
सोशल मीडिया से सड़क तक पहुंचा आंदोलन –
पुनर्वास के मुद्दे को लेकर ग्रामीणों की नाराजगी अब सोशल मीडिया से निकलकर आंदोलन का रूप ले चुकी है। कांग्रेस जिलाध्यक्ष रामराज गोंड के नेतृत्व में रविवार को कांग्रेस का प्रतिनिधिमंडल कजियारी पहुंचा और ग्रामीणों से मुलाकात कर उनके आंदोलन को समर्थन दिया। प्रतिनिधिमंडल ने ग्रामीणों की समस्याओं को सुना और उनके साथ हर आंदोलन में खड़े रहने की बात कही।
रामराज गोंड ने ग्रामीणों की मांग को गंभीर बताते हुए प्रशासन से विस्थापित परिवारों की स्थिति की वास्तविक जांच कराकर पात्र परिवारों को उनका अधिकार दिलाने की जरूरत पर जोर दिया।
नंदू यादव बोले- आश्वासन नहीं, अब चाहिए समाधान
ग्रामीण नंदू यादव का कहना है कि “विस्थापन के समय घर और जमीन जाने के बाद पुनर्वास की उम्मीद थी, लेकिन आज भी कई परिवारों की समस्या जस की तस बनी हुई है। उनका कहना है कि प्रशासन को पुराने अभिलेखों और विस्थापित परिवारों की सूची की निष्पक्ष जांच कराकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-कौन परिवार अब तक अपने अधिकार से वंचित हैं केवल आश्वासन देने से समस्या खत्म नहीं होगी।”
विकास का विरोध नहीं, हक से समझौता भी नहीं-
ग्रामीण आनन्द खरवार का कहना है कि “ग्रामीणों ने विकास का विरोध नहीं किया। उन्होंने अपने घर और खेत गंवाकर परियोजना के लिए सहयोग किया, लेकिन इसके बदले पुनर्वास और आजीविका की सुरक्षित व्यवस्था मिलना उनका अधिकार है। वर्षों बाद भी यदि परिवार जमीन के लिए भटक रहे हैं तो यह गंभीर स्थिति है। ग्रामीण अब आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाला समाधान चाहते हैं।”
उजड़ने का दर्द आज भी झेल रही महिलाएं –
ग्रामीण सुमति देवी ने कहा कि “विस्थापन का सबसे बड़ा असर परिवारों और महिलाओं पर पड़ा है। घर उजड़ने के बाद नए सिरे से जीवन बसाने की उम्मीद थी, लेकिन वर्षों का इंतजार अब नाराजगी में बदल रहा है। उनका कहना है कि प्रशासन को ग्रामीणों की परेशानी को गंभीरता से लेते हुए स्थायी समाधान निकालना चाहिए।”
15 अक्टूबर से आर-पार के आंदोलन की चेतावनी –
ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से मांग की है कि विस्थापित परिवारों की वास्तविक स्थिति की जांच कराकर जिन लोगों को अब तक घर और कृषि भूमि नहीं मिली है, उन्हें उनका अधिकार दिलाया जाए। ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि यदि मांग पर ठोस कार्यवाही नहीं हुई तो 15 अक्टूबर से कलक्ट्रेट पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया जाएगा।
“बहरहाल नगवां डैम में पानी भरे वर्षों बीत चुके हैं, लेकिन कजियारी के कई परिवारों के लिए विस्थापन आज भी खत्म नहीं हुआ है। जिन परिवारों ने विकास की परियोजना के लिए अपनी जमीन और घर गंवाए, अगर उन्हीं परिवारों को वर्षों बाद भी आशियाने और खेती की जमीन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है तो यह केवल पुनर्वास की समस्या नहीं, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल है। आखिर जिन परिवारों की जमीन परियोजना में चली गई, उनके पुनर्वास का पूरा हिसाब कौन देगा? कितने परिवारों को उनका हक मिला और कितने अब भी सरकारी रिकॉर्ड और दफ्तरों के बीच फंसे हुए हैं? अब बड़ा सवाल यही है कि प्रशासन ग्रामीणों के आंदोलन का इंतजार करेगा या 15 अक्टूबर से पहले ही वर्षों पुराने इस विस्थापन के दर्द का स्थायी समाधान निकालेगा।”






