आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
• कागजों में तैयारियों का दौर तेज, पिछली लापरवाहियों से सबक लेने की जरूरत
• अभियान में हुई चूक तो बीमारी पर काबू पाना होगा मुश्किल
सोनभद्र । संचारी रोगों की रोकथाम को लेकर एक बार फिर तैयारियों का दौर शुरू हो गया है। अधिकारी अंतर्विभागीय बैठकें कर संबंधित विभागों को जिम्मेदारियां सौंप रहे हैं और अभियान में किसी भी स्तर पर लापरवाही न बरतने की हिदायत दी जा रही है। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि बैठकों और निर्देशों का असर आखिर जमीन पर कितना दिखाई देगा?
संचारी रोगों की रोकथाम केवल बैठक करने और कागजों पर कार्ययोजना तैयार करने से संभव नहीं है। इसके लिए गांव से लेकर शहर तक नियमित साफ-सफाई, जलभराव की समस्या का तत्काल निस्तारण, मच्छरों के प्रजनन स्थलों पर प्रभावी नियंत्रण, फॉगिंग और एंटी लार्वा का छिड़काव तथा लोगों के बीच लगातार जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है। किसी एक विभाग की ढिलाई भी पूरे अभियान की कवायद पर पानी फेर सकती है।
अंतर्विभागीय बैठक में अधिकारियों की ओर से सभी संबंधित विभागों को समय से अपने दायित्व पूरे करने और अभियान के दौरान किसी प्रकार की लापरवाही नहीं होने देने के निर्देश दिए जा रहे हैं। मगर सवाल यह है कि क्या इन निर्देशों की निगरानी भी उतनी ही गंभीरता से होगी, जितनी गंभीरता से बैठक में चेतावनी दी जाती है?
बारिश के बाद जगह-जगह जमा पानी, नालियों की सफाई और मच्छरों के बढ़ते प्रकोप को लेकर लगातार सतर्कता की जरूरत रहती है। ऐसे में यदि सफाई व्यवस्था कमजोर रही या जलभराव वाले स्थानों पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो संचारी रोगों की रोकथाम का अभियान महज औपचारिकता बनकर रह सकता है।
बैठक नहीं, जमीन पर चाहिए असर –
अभियान की सफलता का असली पैमाना बैठकों की संख्या या जारी किए गए निर्देश नहीं, बल्कि गांवों और कस्बों में दिखाई देने वाली कार्यवाही होगी। स्वास्थ्य विभाग के साथ पंचायती राज, नगर निकाय, शिक्षा, बाल विकास, पशुपालन और अन्य संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय बेहद जरूरी है।
“बहरहाल बारिश का आखिरी दौर खत्म होने को है, लेकिन इसके साथ ही संचारी रोगों का खतरा दस्तक दे रहा है। ऐसे में यदि विभाग सिर्फ बैठकों, निर्देशों और कागजी तैयारियों तक सीमित रहे तो पूरा अभियान महज खानापूर्ति बनकर रह जाएगा। जलभराव, बजबजाती नालियां और मच्छरों के पनपने वाले स्थानों पर तत्काल कार्यवाही जरूरी है। अब देखने वाली बात यह है कि जिम्मेदार विभाग चेतावनियों को जमीन पर उतारते हैं या फिर बीमारी फैलने के बाद जागने की पुरानी व्यवस्था दोहराई जाती है।”





