आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । जिन कंधों पर देश के भविष्य को गढ़ने की जिम्मेदारी है, आज वही शिक्षक अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं। 14 वर्षों से शोषण और उपेक्षा का दंश झेल रहे उच्च प्राथमिक विद्यालयों के अनुदेशक शिक्षकों के सब्र का बांध अब टूटने लगा है। आरोप है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार उनके हक में निर्णय लागू करने से पीछे हट रही है। ऐसे में न्याय की आस लगाए अनुदेशक शिक्षकों ने जिलाधिकारी कार्यालय परिसर स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने अपनी पीड़ा बयां करते हुए सरकार से न्याय की गुहार लगाई। सवाल यह है कि जब देश की सर्वोच्च अदालत से राहत मिल चुकी है, तो फिर उसके अनुपालन के लिए अनुदेशकों को सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज क्यों बुलंद करनी पड़ रही है?
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे परिषदीय अनुदेशक उत्थान समिति के संरक्षक विनय मौर्या ने कहा कि “प्रदेश के उच्च प्राथमिक विद्यालयों में वर्षों से सेवाएं देने के बावजूद उन्हें उनके विधिक एवं मौलिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। अपने हक की लड़ाई के लिए उन्होंने सरकार के विभिन्न स्तरों पर लगातार गुहार लगाई। लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा, जहां तमाम तर्कों, साक्ष्यों और सुनवाई के बाद गत चार फरवरी को 46 पृष्ठों का निर्णय सुनाया गया। अनुदेशकों का दावा है कि इस फैसले में उनके वेतन, बकाया एरियर और अन्य सुविधाओं के संबंध में राहत प्रदान की गई है।”
रिव्यू पिटिशन खारिज, फिर भी शासनादेश का इंतजार –
जिलाध्यक्ष मुकेश कुमार राय ने कहा कि “सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुपालन में प्रदेश सरकार ने अब तक आवश्यक शासनादेश जारी नहीं किया है। उनका कहना है कि सरकार की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका भी सर्वोच्च न्यायालय खारिज कर चुका है, इसके बावजूद फैसले को लागू करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। इस स्थिति ने उन शिक्षकों की चिंता बढ़ा दी है, जो वर्षों से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं।”
न्याय के लिए अब गांधी और बाबा साहेब के रास्ते पर संघर्ष –
अनुदेशकों का कहना है कि वे राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं, लेकिन अपने ही अधिकारों के लिए उन्हें लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है। ज्ञापन, पैरवी और बार-बार की गई अपीलों के बाद भी राहत नहीं मिलने से उनमें निराशा और आक्रोश बढ़ रहा है। इसी पीड़ा को समाज के सामने रखने के लिए उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सत्य एवं अहिंसा के मार्ग और संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के संवैधानिक आदर्शों को अपना आधार बनाया है।
अनुदेशकों की मांग है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का सम्मान करते हुए उसका शीघ्र अनुपालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि उन्हें वर्षों से लंबित न्याय मिल सके। उनका कहना है कि शिक्षक समाज को दिशा देने और बच्चों का भविष्य संवारने का दायित्व निभाता है, ऐसे में शिक्षकों को ही अपने अधिकारों के लिए वर्षों तक संघर्ष करना पड़े, यह व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल खड़ा करता है।
इस दौरान शिवकांत त्रिपाठी, राम विजय यादव, रमेश कुमार चौधरी, मोहित कुमार, महेश सिंह, राजकुमार, संदीप कुमार, वीरेंद्र यादव, श्याम सुंदर, सौरभ पांडेय सहित बड़ी संख्या में अनुदेशक मौजूद रहे।
Author: Anand Kumar Chaubey
9 years experience in Journalism....





