पूर्वांचल की धरती पर सुरक्षा के नाम पर ‘गन कल्चर’ का एक नया और अनोखा रूप देखने को मिल रहा है, जहां सरकारी गनर अब आत्मरक्षा का साधन कम और रसूख व सामाजिक दबदबा दिखाने का जरिया ज्यादा बन गए हैं। माफिया से ‘माननीय’ बने नेताओं और बाहुबली छवि के दिग्गजों का इस क्षेत्र में ऐसा दबदबा है कि सांसद, विधायक, एमएलसी और जिला पंचायत अध्यक्ष ही नहीं, बल्कि ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य, सत्तारूढ़ दल के पदाधिकारी और छोटे-मोटे छुटभैये नेता भी अपने पीछे सरकारी गनर दौड़ा रहे हैं। वाराणसी जोन के आंकड़ों पर गौर करें तो इस पूरे क्षेत्र में गनर लेकर चलने की होड़ मची हुई है, जिसने पुलिस महकमे के एक बड़े हिस्से को नेताओं की सुरक्षा में झोंक दिया है। वाराणसी जोन के 9 जिलों में कुल 436 सरकारी गनर तैनात हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा यानी 348 गनर सिर्फ और सिर्फ नेताओं की तीमारदारी और सुरक्षा में लगे हैं। इस सुरक्षा बेड़े में 264 कांस्टेबल, 80 हेड कांस्टेबल और चार दरोगा शामिल हैं, जिन्हें शासन और जिला प्रशासन ने नेताओं की सुरक्षा और उनके ‘भौकाल’ को बनाए रखने के लिए मुहैया कराया है।
दिलचस्प बात यह है कि इस गन कल्चर की रेस में आजमगढ़ जिला सबसे आगे है, जहां सर्वाधिक 98 गनर तैनात हैं, जबकि सबसे कम 19 गनर भदोही जिले में हैं। अन्य जिलों की बात करें तो राजनीतिक रसूख के मामले में जौनपुर में एक दरोगा, 13 हेड कांस्टेबल और 46 कांस्टेबल नेताओं की सुरक्षा संभाल रहे हैं। वहीं, गाजीपुर में 8 हेड कांस्टेबल और 51 कांस्टेबल, जबकि चंदौली में एक दरोगा, 8 हेड कांस्टेबल और 18 कांस्टेबल तैनात हैं। आजमगढ़ में नेताओं की सेवा में एक दरोगा, 19 हेड कांस्टेबल और 48 कांस्टेबल मुस्तैद हैं। मऊ में एक हेड कांस्टेबल और 26 कांस्टेबल, बलिया में 7 हेड कांस्टेबल और 45 कांस्टेबल, मिर्जापुर में एक दरोगा, 13 हेड कांस्टेबल और 10 कांस्टेबल, जबकि सोनभद्र में 8 हेड कांस्टेबल व 13 कांस्टेबल और भदोही में 3 हेड कांस्टेबल व 7 कांस्टेबल नेताओं के साथ साए की तरह चल रहे हैं। यह आंकड़े साफ बयां करते हैं कि नेताओं के लिए गनर रखना अब जरूरत से ज्यादा एक अनिवार्य ‘स्टेटस सिंबल’ बन चुका है।
नेताओं और बाहुबलियों के इस भारी-भरकम सुरक्षा तामझाम के बीच उन जमीनी पीड़ितों, व्यापारियों और उद्यमियों की स्थिति बेहद दोयम दर्जे की नजर आती है, जिन्हें असल में जान का खतरा है। रंगदारी, फिरौती और आपराधिक धमकियों से सहमे रसूखदार और व्यापारियों को भी सुरक्षा तो मिली है, लेकिन उनके हिस्से में नेताओं जैसी ‘कमांडो’ स्तर की सुरक्षा नहीं है। पूरी सुरक्षा व्यवस्था में व्यापारियों और धमकियां पाने वाले पीड़ितों को एक भी दरोगा नसीब नहीं हुआ है। व्यापारियों की सुरक्षा के लिए महज 7 हेड कांस्टेबल और 29 कांस्टेबल लगाए गए हैं, जबकि धमकियों के शिकार अन्य पीड़ितों को 13 हेड कांस्टेबल और 40 कांस्टेबल की सुरक्षा मिली है। पूर्वांचल में यह गन कल्चर इस कदर हावी हो चुका है कि खुद को बड़ा दिखाने और इलाके में अपना माहौल बनाने के लिए हर महीने जिला प्रशासनों के पास गनर पाने के ढेरों आवेदन पहुंच रहे हैं। जिला, मंडलीय और शासन स्तर की कमेटियों द्वारा खतरों की समीक्षा कर तीन, छह और नौ महीने के लिए गनर मंजूर किए जाते हैं। इस पूरे मामले पर वाराणसी जोन के एडीजी पीयूष मोर्डिया का कहना है कि सरकारी सुरक्षा पूरी तरह से तय नियमों के तहत शासन, मंडलीय और जिला स्तर की कमेटियों की जांच रिपोर्ट के आधार पर ही दी जाती है, साथ ही कई मामलों में कोर्ट के आदेश पर भी गनर मुहैया कराए जाते हैं। लेकिन धरातल पर इस व्यवस्था ने पुलिस की एक बड़ी नफरी को माननीयों के रसूख की ढाल बना दिया है।






