आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । निजी अस्पतालों में ऑपरेशन के दौरान महिलाओं की मौत हो रही है, मरीजों की जिंदगी से जुड़े सवाल उठ रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही अब भी सवालों के घेरे में है। विडंबना देखिए, जिस विभाग के कंधों पर मरीजों की जान की हिफाजत की जिम्मेदारी है, उसी विभाग की निगरानी में जिले में 100 से अधिक निजी अस्पतालों को पंजीकरण देकर संचालन की अनुमति दी गई। सवाल यह नहीं कि अस्पताल कितने खुले, बल्कि सवाल यह है कि इन अस्पतालों में ऑपरेशन के लिए जरूरी विशेषज्ञ चिकित्सक और एनेस्थेटिक उपलब्ध भी हैं या नहीं? जब जिले में एनेस्थीसिया विशेषज्ञों की उपलब्धता ही सीमित बताई जा रही है तो इतने अस्पतालों में ऑपरेशन की व्यवस्था आखिर किस भरोसे चल रही है? क्या स्वास्थ्य विभाग ने पंजीकरण देते समय मानकों का गंभीरता से सत्यापन किया या फिर कागजी खानापूर्ति के आधार पर मरीजों की जिंदगी से जुड़े फैसले ले लिए गए? यदि मानकों की जांच किए बिना पंजीकरण जारी किए गए तो उन अधिकारियों की जवाबदेही कौन तय करेगा, जिनकी कलम से इन अस्पतालों को संचालन की अनुमति मिली? आखिर हर मौत के बाद अस्पताल संचालक ही कठघरे में क्यों खड़ा होता है, पंजीकरण देने और निगरानी करने वाला विभाग क्यों नहीं?
पंजीकरण की संख्या बड़ी, विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता पर सन्नाटा –
सोनभद्र जैसे बड़े और भौगोलिक दृष्टि से विस्तृत जनपद में निजी अस्पतालों की संख्या 100 से अधिक बताई जा रही है। इनमें कई अस्पतालों में ऑपरेशन की सुविधा भी उपलब्ध है। लेकिन इन अस्पतालों में एनेस्थेटिक विशेषज्ञों की वास्तविक उपलब्धता को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। यदि जिले में महज एक एनेस्थीसिया विशेषज्ञ की उपलब्धता है तो यह अपने आप में स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है।
ऑपरेशन कोई सामान्य चिकित्सकीय प्रक्रिया नहीं है। इसमें सर्जन के साथ एनेस्थीसिया विशेषज्ञ की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। मरीज को बेहोश करने से लेकर ऑपरेशन के दौरान उसकी शारीरिक स्थिति पर नजर रखने और आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने तक विशेषज्ञ की मौजूदगी जरूरी है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जिन निजी अस्पतालों को ऑपरेशन की सुविधा के साथ पंजीकरण दिया गया, वहां एनेस्थीसिया की व्यवस्था किस आधार पर सुनिश्चित की गई? क्या प्रत्येक अस्पताल में निर्धारित मानकों के अनुरूप विशेषज्ञ उपलब्ध थे या फिर ऑनकॉल व्यवस्था के नाम पर कागजी औपचारिकता पूरी कर दी गई।
बड़े अस्पतालों पर विभाग की कथित मेहरबानी –
विभागीय सूत्रों की मानें तो जिले के कुछ बड़े निजी अस्पतालों में स्वास्थ्य विभाग की कथित मेहरबानी को लेकर भी चर्चाएं होती रही हैं। आरोप यह भी हैं कि कुछ सरकारी एनेस्थीसिया विशेषज्ञ निजी अस्पतालों में अपनी सेवाएं देने जाते हैं। यदि ऐसा है तो इसकी वैधानिकता, अनुमति और विभागीय जानकारी की जांच क्यों नहीं कराई जाती? क्या सरकारी चिकित्सकों की निजी अस्पतालों में सेवाएं देने के संबंध में कोई स्पष्ट व्यवस्था है? क्या संबंधित अस्पतालों के पंजीकरण में उनकी उपलब्धता को आधार बनाया गया है? यदि हां, तो क्या एक ही चिकित्सक की सेवाओं को कई अस्पतालों के मानकों की पूर्ति के लिए दिखाया जा सकता है? इन सवालों का जवाब स्वास्थ्य विभाग को देना चाहिए। सबसे गंभीर बात यह है कि यदि विभागीय अधिकारियों को ऐसी गतिविधियों की जानकारी है तो कार्रवाई के लिए किसी शिकायत का इंतजार क्यों किया जाता है? मरीजों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में विभाग का दायित्व केवल शिकायत मिलने के बाद जागना नहीं, बल्कि अनियमितताओं को पहले ही रोकना है।
सीएमओ के दावों की कसौटी पर पंजीकरण व्यवस्था –
मुख्य चिकित्साधिकारी स्वयं एनेस्थीसिया विशेषज्ञ हैं। वह लगातार यह दावा करते रहे हैं कि एमबीबीएस चिकित्सक, सर्जन और एनेस्थेटिक की उपलब्धता के बिना निजी अस्पतालों को पंजीकरण नहीं दिया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि उनके कार्यकाल में जारी किए गए पंजीकरणों में इन मानकों का कितना पालन हुआ? इसकी निष्पक्षता से अंतर्विभागीय जांच कराई जाए तो पंजीकरण प्रक्रिया की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है। प्रत्येक अस्पताल की पंजीकरण फाइल, चिकित्सकों की नियुक्ति, उनकी उपलब्धता, ऑपरेशन थिएटर की व्यवस्था और भौतिक सत्यापन की रिपोर्ट की जांच होनी चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पंजीकरण जारी करने से पहले संबंधित अधिकारियों ने अस्पतालों का स्थलीय निरीक्षण किया था या नहीं। यदि निरीक्षण किया गया तो किन मानकों पर अस्पतालों को उपयुक्त पाया गया? और यदि किसी अस्पताल में बाद में विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता समाप्त हो गई तो उसके पंजीकरण की समीक्षा क्यों नहीं हुई?
मौत के बाद जांच, लेकिन पंजीकरण के समय जिम्मेदारी किसकी –
ऑपरेशन के दौरान महिलाओं की मौत की घटनाएं केवल अस्पताल संचालकों की कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं खड़े करतीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की समीक्षा की मांग करती हैं, जिसके तहत ऐसे अस्पतालों को संचालन की अनुमति मिलती है। यदि किसी अस्पताल में जरूरी विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध नहीं हैं, आपातकालीन व्यवस्था पर्याप्त नहीं है या निर्धारित चिकित्सा मानकों का पालन नहीं हो रहा है तो ऐसे अस्पतालों को पंजीकरण कैसे मिल गया? क्या स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी केवल पंजीकरण जारी करने तक सीमित है? क्या समय-समय पर निरीक्षण करना और मानकों का पालन सुनिश्चित करना उसकी जिम्मेदारी नहीं है?
किसी अस्पताल में इलाज के दौरान मरीज की मौत होने पर जांच अस्पताल तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि संबंधित अस्पताल को पंजीकरण किसने दिया, किन दस्तावेजों के आधार पर दिया और बाद में उसकी निगरानी किस अधिकारी ने की।
अब पंजीकरण से लेकर मौतों तक की हो निष्पक्ष जांच –
जनपद के सभी निजी अस्पतालों के पंजीकरण की उच्चस्तरीय अंतर्विभागीय जांच कराई जानी चाहिए। ऑपरेशन करने वाले अस्पतालों में सर्जन और एनेस्थेटिक की वास्तविक उपलब्धता का भौतिक सत्यापन हो। सरकारी चिकित्सकों की निजी अस्पतालों में सेवाएं देने के आरोपों की जांच हो। ऑपरेशन के दौरान महिलाओं की मौत के मामलों का विशेषज्ञ चिकित्सकों की समिति से चिकित्सकीय ऑडिट कराया जाए। जिन अस्पतालों में मानकों का उल्लंघन मिले, उनके खिलाफ कार्यवाही के साथ पंजीकरण जारी करने और निगरानी में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की जाएगी।
Author: Anand Kumar Chaubey
9 years experience in Journalism....





