आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
• सीएमओ की नाक के नीचे धड़ल्ले से संचालित हो रहे अवैध अस्पताल
• किसी मरीज की मौत के बाद जागता है स्वास्थ्य महकमा
• महज शांति भंग की धारा लगाकर पुलिस कर लेती है मामले की इतिश्री या खुलेगी मारपीट के कारण की परत
सोनभद्र । आदिवासी और अति पिछड़े जिले के रूप में पहचाने जाने वाले सोनभद्र में गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों की मजबूरी को कथित तौर पर कमाई का जरिया बनाने वाले निजी अस्पतालों के नेटवर्क पर एक वायरल वीडियो ने गंभीर सवाल खड़ा कर दिया हैं। इलाज के नाम पर पहले भरोसा, फिर रेफरल और उसके बाद भारी-भरकम बिल। क्या जिले के मरीज की बीमारी के साथ उसकी आर्थिक मजबूरी का भी सौदा हो रहा है? बुधवार को चुर्क तिराहे का बताया जा रहा महज 51 सेकेंड का वायरल वीडियो इसी सवाल को और गहरा कर रहा है।
कमीशनखोरी को लेकर भिड़े दो अवैध हॉस्पिटल संचालक –
वायरल वीडियो में दो पक्षों के दर्जनों युवक आपस में भिड़ते दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को लेकर दावा किया जा रहा है कि विवाद की वजह वाराणसी रेफर किए गए एक मरीज से जुड़े कथित कमीशन को लेकर हुआ। यदि यह दावा जांच में सही पाया जाता है तो मामला केवल दो पक्षों के विवाद या मारपीट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह मरीजों के रेफरल के नाम पर कथित कमीशनखोरी के पूरे नेटवर्क की गंभीर जांच का विषय बन जाएगा। हालांकि, नवहिंद समाचार इस वायरल वीडियो की पुष्टि नहीं करता है।
पहले दिखाते हैं बेहतर इलाज का सपना, फिर शुरू होता है रेफरल का खेल –
आरोप है कि जिले में संचालित कुछ कथित अवैध अस्पताल मरीज और उनके परिजनों को बेहतर इलाज का भरोसा देकर अपने यहां भर्ती करते हैं। स्थिति गंभीर होने या इलाज संभव नहीं होने की बात कहकर उन्हें वाराणसी के उन अस्पतालों में रेफर किया जाता है, जहां कथित तौर पर पहले से ही संपर्क अथवा सेटिंग रहती है।
आरोपों के मुताबिक, मरीज के वाराणसी पहुंचने के बाद वहां इलाज का खर्च तेजी से बढ़ता जाता है। जांच, दवा, ऑपरेशन, आईसीयू और अन्य मदों के नाम पर भारी-भरकम बिल सामने आता है। गरीब परिवार इस खर्च को पूरा करने के लिए जमीन बेचने, मकान गिरवी रखने या कर्ज लेने तक को मजबूर हो जाते हैं। यानी जिस मरीज को बेहतर इलाज की उम्मीद दिखाकर अस्पताल तक लाया जाता है, उसके लिए इलाज का यह कथित नेटवर्क कई बार बीमारी के साथ आर्थिक तबाही का कारण भी बन सकता है।
मरीज के रेफरल पर भिड़ गए तो क्या खुलेंगे कमीशन के राज –
वायरल वीडियो ने इस पूरे कथित खेल में सबसे अहम सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मरीज के रेफरल पर मिलने वाले कमीशन को लेकर अस्पताल संचालकों के बीच प्रतिस्पर्धा चल रही है? यदि विवाद की वजह वास्तव में मरीज के रेफरल से मिलने वाला कथित कमीशन है तो पुलिस जांच में यह सामने आना चाहिए कि मरीज किस अस्पताल से कहां रेफर हुआ, रेफर करने की वजह क्या थी, संबंधित अस्पताल का पंजीकरण क्या है और रेफरल के बदले किसी तरह का आर्थिक लेनदेन हुआ या नहीं।
छपका-उरमौरा बना कथित अवैध अस्पतालों का अड्डा –
छपका और उरमौरा क्षेत्र में कई कथित अवैध अस्पतालों के संचालन को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप है कि क्षेत्र में बिना जरूरी मानकों और वैध अनुमति के अस्पताल संचालित किए जा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर है। जब मुख्य चिकित्साधिकारी और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी लगातार जिले में भ्रमण करते हैं, तब कथित अवैध अस्पतालों का संचालन उनकी नजरों से कैसे बच जाता है? मरीज की मौत या गंभीर घटना के बाद अस्पताल की वैधता सामने आना आखिर किस तरह की निगरानी व्यवस्था को दर्शाता है? क्या स्वास्थ्य विभाग की कार्यवाही का इंतजार किसी मरीज की जिंदगी खत्म होने के बाद ही किया जाएगा?
पुलिस और स्वास्थ्य विभाग दोनों के सामने अग्निपरीक्षा –
वायरल वीडियो ने पुलिस और स्वास्थ्य विभाग दोनों के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। पुलिस के लिए सवाल सिर्फ मारपीट की जांच का नहीं, बल्कि विवाद के पीछे मरीज के रेफरल और कथित कमीशन का सच सामने लाने का भी है। वहीं स्वास्थ्य विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि छपका, उरमौरा और आस-पास के क्षेत्रों में संचालित अस्पतालों में कितने वैध हैं और उन अवैध हॉस्पिटलों का लंबे समय से संचालन कैसे और किसकी शह पर किए जा रहे है?
“बहरहाल वायरल वीडियो की सच्चाई और विवाद की वास्तविक वजह जांच का विषय है, लेकिन इसने सोनभद्र में मरीजों के इलाज और रेफरल के नाम पर चल रहे कथित खेल पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। यदि मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजने के पीछे वास्तव में कमीशन का नेटवर्क संचालित है तो यह सिर्फ आर्थिक अनियमितता नहीं, बल्कि मरीज की मजबूरी और जिंदगी से खिलवाड़ का गंभीर मामला है। सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर है कि जब अधिकारी लगातार इन इलाकों में आते-जाते हैं तो कथित अवैध अस्पतालों के संचालन की जानकारी कार्यवाही के बाद ही क्यों होती है? क्या स्वास्थ्य विभाग किसी हादसे, मौत या विवाद का इंतजार कर रहा है? ऐसे में जरूरत महज किसी एक अस्पताल को सील करने की नहीं, बल्कि कथित रेफरल-कमीशन नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने और जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करने की है। वरना हर घटना के बाद कार्यवाही का दावा और फिर उसी ढर्रे पर अवैध अस्पतालों का संचालन, स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता रहेगा। ऐसे में अब देखना यह है कि संबंधित विभाग इस वायरल वीडियो को महज मामूली मारपीट की घटना मानकर नजरअंदाज करता है या फिर मरीजों के कथित रेफरल-कमीशन नेटवर्क और क्षेत्र में संचालित अस्पतालों की वैधता की व्यापक जांच कर तस्वीर साफ करता हैं।”





