आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)सोनभद्र । मरीजों की मजबूरी को कमाई का जरिया बनाने वाले अवैध जांच केंद्रों के खिलाफ आखिरकार स्वास्थ्य विभाग की कुंभकर्णी निद्रा टूट ही गई। म्योरपुर में सीएचसी के ठीक नाक के नीचे लंबे समय से फल-फूल रहे अवैध पैथोलॉजी और जांच केंद्रों पर बुधवार को स्वास्थ्य विभाग का हंटर चला। निजी अस्पताल और पैथोलॉजी पंजीकरण के नोडल अधिकारी की टीम ने छापेमारी कर चार पैथोलॉजी सेंटर, एक डिजिटल एक्स-रे सेंटर और एक डेंटल क्लीनिक समेत छह प्रतिष्ठानों को सील कर दिया। इस कार्यवाही से न सिर्फ स्वास्थ्य माफियाओं में हड़कंप मच गया, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगा दिया। सवाल सीधा है कि जब सीएचसी के मुख्य गेट के सामने ही अवैध लैबों का कारोबार खुलेआम चल रहा था, तो अस्पताल प्रशासन और स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों की निगाह आखिर कहां थी? क्या मरीजों की जिंदगी से जुड़े इस गंभीर मामले को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा था।
निजी अस्पतालों के नोडल अधिकारी डॉ0 गुलाब शंकर यादव के नेतृत्व में बुधवार स्वास्थ्य विभाग की टीम ने म्योरपुर सीएचसी के सामने संचालित सिंह पैथोलॉजी, रियल पैथोलॉजी, न्यू कुमार पैथोलॉजी, न्यू कुमार एक्स-रे सेंटर और आर0के0 पैथोलॉजी समेत चार पैथोलॉजी सेंटर एवं एक डिजिटल एक्स-रे सेंटर को सील किया। इसके साथ ही म्योरपुर में संचालित सोनभद्र डेंटल क्लीनिक पर भी ताला जड़ दिया गया। कार्यवाही के दौरान म्योरपुर पुलिस और सीएचसी अधीक्षक भी मौजूद रहे
अस्पताल के गेट पर अवैध कारोबार, फिर भी जिम्मेदार बने रहे बेखबर –
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि अवैध रूप से संचालित बताए जा रहे ये प्रतिष्ठान किसी सुनसान गली या दूरदराज इलाके में नहीं, बल्कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के मुख्य गेट के ठीक सामने चल रहे थे। जहां रोजाना सैकड़ों मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं, वहीं जांच के नाम पर संचालित इन प्रतिष्ठानों की वैधता की पड़ताल करना स्थानीय स्वास्थ्य प्रशासन की जिम्मेदारी भी थी।
ऐसे में सीएचसी अधीक्षक की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर लंबे समय से अस्पताल के ठीक सामने चल रहे इन पैथोलॉजी सेंटरों पर उनकी निगाह क्यों नहीं गई? क्या उन्होंने कभी इनके पंजीकरण और संचालन की वैधता जानने की कोशिश की? यदि अवैध संचालन की जानकारी थी तो उच्चाधिकारियों को इसकी सूचना क्यों नहीं दी गई? और यदि जानकारी नहीं थी तो अस्पताल के मुख्य गेट के सामने चल रहे इतने प्रतिष्ठानों से अनजान रहना किस तरह की निगरानी व्यवस्था को दर्शाता है? यह स्थिति सीएचसी प्रशासन की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
गलत जांच रिपोर्ट यानी मरीज की जान से सीधा खिलवाड़!
पैथोलॉजी सेंटर महज खून और पेशाब की जांच करने वाली दुकानें नहीं हैं। डॉक्टरों का इलाज काफी हद तक जांच रिपोर्ट पर निर्भर करता है। ऐसे में यदि बिना निर्धारित मानकों और जरूरी तकनीकी व्यवस्था के जांच की जा रही हो, तो गलत रिपोर्ट मरीज के इलाज की पूरी दिशा बदल सकती है। गलत रिपोर्ट के आधार पर गलत दवाएं, अनावश्यक इलाज और गंभीर बीमारी की पहचान में देरी तक हो सकती है। इसका सबसे बड़ा खामियाजा गरीब और असहाय मरीजों को भुगतना पड़ सकता है। जिले के कई हिस्सों में आज भी सैकड़ों पैथोलॉजी सेंटर धड़ल्ले से संचालित होने की शिकायतें हैं। इनमें कितने पंजीकृत हैं और कितने नियमों को ताक पर रखकर मरीजों की जेब काट रहे हैं, इसका जवाब स्वास्थ्य विभाग के पास होना चाहिए। आखिर कब तक मरीज अपनी गाढ़ी कमाई खर्च कर ऐसी जांच रिपोर्टों के भरोसे इलाज कराते रहेंगे, जिनकी विश्वसनीयता तक संदिग्ध हो सकती है।
छह सेंटर हुए सील, अब जिम्मेदारों की कौन तय करेगा जवाबदेही –
एसीएमओ डॉ0 गुलाब शंकर यादव ने बताया कि “जिले में अवैध अस्पतालों, क्लीनिकों और पैथोलॉजी सेंटरों के खिलाफ अभियान चलाकर कार्यवाही की जा रही है। जांच में अवैध संचालन मिलने पर प्रतिष्ठानों को सील किया जा रहा है। उन्होंने सभी संचालकों से अपने अस्पताल, क्लीनिक और पैथोलॉजी सेंटर का अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराने की अपील की है। बिना पंजीकरण संचालन मिलने पर कार्यवाही की जाएगी।”
“बहरहाल म्योरपुर में छह प्रतिष्ठानों को सील कर स्वास्थ्य विभाग ने अपनी सक्रियता तो दिखाई, लेकिन असली सवाल अब भी कायम है कि आखिर इतने लंबे समय तक सीएचसी के मुख्य गेट के ठीक सामने अवैध जांच का कारोबार किसकी निगाहों के सामने फलता-फूलता रहा? क्या अस्पताल अधीक्षक ने कभी इन सेंटरों के पंजीकरण की पड़ताल नहीं की या फिर सब कुछ देखकर भी अनदेखा किया जाता रहा? यदि सरकारी अस्पताल के दरवाजे पर ही नियमों की धज्जियां उड़ती रहीं तो दूरदराज के इलाकों में संचालित पैथोलॉजी सेंटरों की निगरानी कौन कर रहा होगा? जिले के सैकड़ों जांच केंद्रों में कितने वैध हैं और कितने मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं, इसका जवाब स्वास्थ्य विभाग को देना होगा। सवाल यह भी है कि गलत रिपोर्ट से किसी गरीब मरीज की जान चली गई तो उसकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा? ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या स्वास्थ्य विभाग की यह कार्यवाही महज एक दिन की औपचारिकता बनकर रह जाएगी या फिर अवैध हॉस्पिटल, पैथोलॉजी और क्लीनिकों के खिलाफ यह मुहिम लगातार जारी रहेगी? अब देखना होगा कि विभाग की यह कथित सक्रियता कितने दिनों तक कायम रहती है और क्या कार्यवाही का यह डंडा जिले के अन्य इलाकों में फल-फूल रहे अवैध जांच केंद्रों तक भी पहुंचता है या फिर कुछ दिनों बाद सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आएगा।”
Author: Anand Kumar Chaubey
9 years experience in Journalism....






