आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । जिले में आशा कार्यकर्ताओं और आशा संगिनियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल का असर अब स्वास्थ्य विभाग के महत्वपूर्ण अभियानों पर भी दिखाई देने लगा है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ मानी जाने वाली आशा कार्यकर्ताओं के कार्य बहिष्कार से संचारी रोग नियंत्रण और दस्तक अभियान प्रभावित होने की स्थिति पैदा हो गई है। हालात ऐसे हो गए हैं कि जिन क्षेत्रों में आशा कार्यकर्ता काम नहीं कर रही हैं, वहां अभियान की जिम्मेदारी अब आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सौंपने की तैयारी है। मुख्य चिकित्साधिकारी की ओर से जारी निर्देश ने न केवल स्वास्थ्य विभाग की चिंता उजागर की है, बल्कि आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका और उनकी मांगों को लेकर चल रहे विवाद को भी फिर चर्चा में ला दिया है।
सीएमओ कार्यालय पर आशाओं ने किया प्रदर्शन –
वही आज नगर स्थित अर्बन पीएचसी पर शहरी आशाओं ने जिलाध्यक्ष मंजू मौर्या के नेतृत्व में अपने मांगों के समर्थन में प्रदर्शन किया और सरकार को चेताया कि अब उन्हें प्रलोभन और आश्वासन नहीं बल्कि उनका हक चाहिए। इस दौरान रेखा, शांति, रेखा देवी, लक्ष्मी, अनुराधा सहित बड़ी संख्या में आशाएँ शामिल रही।
आशाओं के बिना अभियान चलाने की तैयारी –
वहीं मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ0 रमेश कुमार मिश्रा ने शासन के निर्देशों के क्रम में संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को निर्देशित किया है कि दस्तक अभियान के दौरान जिन क्षेत्रों में आशा कार्यकर्ता हड़ताल पर हैं और उनके द्वारा कार्य नहीं किया जा रहा है, वहां आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से काम कराया जाना सुनिश्चित किया जाए। सीएमओ के मुताबिक, राज्य मुख्यालय स्तर पर आयोजित जूम मीटिंग में इस संबंध में निर्देश प्राप्त हुए हैं। इसके बाद जिले में वैकल्पिक व्यवस्था के तहत अभियान को आगे बढ़ाने की तैयारी शुरू हो गई है।
मांगों का समाधान नहीं, दूसरे कर्मचारियों पर डाली जिम्मेदारी –
आशा कार्यकर्ताओं की हड़ताल ने स्वास्थ्य विभाग के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। सवाल यह है कि जब आशा कार्यकर्ताओं की सेवाएं ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए इतनी महत्वपूर्ण हैं कि उनके कार्य बहिष्कार से सरकारी अभियान प्रभावित होने लगे हैं, तो उनकी मांगों के समाधान के लिए ठोस पहल क्यों नहीं हो रही है? क्या केवल दूसरे विभाग के कर्मचारियों को जिम्मेदारी सौंप देने से समस्या का स्थायी समाधान हो जाएगा? आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से अतिरिक्त काम कराने की व्यवस्था भले ही अभियान को जारी रखने का प्रयास हो, लेकिन इससे आशाओं और उनके आंदोलन से जुड़े मूल सवाल खत्म नहीं हो जाते।
स्वास्थ्य व्यवस्था में आशाओं की अहम भूमिका –
गांवों में गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की देखभाल से लेकर टीकाकरण, स्वास्थ्य जागरूकता और विभिन्न सरकारी स्वास्थ्य अभियानों को लोगों तक पहुंचाने में आशा कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। वे घर-घर जाकर लोगों से संपर्क करती हैं और स्वास्थ्य विभाग तथा आम जनता के बीच कड़ी का काम करती हैं। ऐसे में उनका अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार केवल कर्मचारियों के आंदोलन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर स्वास्थ्य विभाग की जमीनी गतिविधियों पर भी पड़ने लगा है।
आशाओं की नाराजगी दूर करने के बजाय वैकल्पिक व्यवस्था पर जोर –
हड़ताल के बीच आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से काम कराने का निर्देश तत्कालीन व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास जरूर है, लेकिन इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या स्वास्थ्य विभाग और शासन का पूरा जोर केवल अभियान को किसी तरह पूरा कराने पर है? कर्मचारियों की समस्याओं और मांगों पर संवाद कर समाधान निकालना भी शासन की जिम्मेदारी है। यदि आशा कार्यकर्ताओं की नाराजगी लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर दूसरे स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है। ऐसे में जरूरत केवल वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की नहीं, बल्कि आंदोलन के कारणों को समझकर समाधान निकालने की है।
“बहरहाल बड़ा सवाल यह है कि जिस आशा कार्यकर्ता के भरोसे गांव-गांव तक स्वास्थ्य योजनाएं पहुंचाई जाती हैं, उसकी आवाज उठने पर व्यवस्था दूसरे कर्मचारियों के सहारे अभियान चलाने की कोशिश क्यों कर रही है? क्या सरकार और स्वास्थ्य विभाग आशाओं की मांगों पर गंभीरता से विचार कर हड़ताल समाप्त कराने की पहल करेंगे या फिर जिम्मेदारियां इधर से उधर सौंपकर जमीनी स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियों को टालने का प्रयास जारी रहेगा?”
Author: Anand Kumar Chaubey
9 years experience in Journalism....






