सोनभद्र में अवैध खनन का कड़वा सच: जल , जीवन और जमीन मांगते न्याय

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कुशाग्र कौशल शर्मा 

उत्तर प्रदेश का सोनभद्र जिला प्राकृतिक सौंदर्यता, खनिज संपदा और अपनी भौगोलिक स्थिति के लिए जाना जाता है। भौगोलिक दृष्टि से अगर देखा जाए तो यह देश का एकमात्र ऐसा जिला है जिससे चार राज्यों बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमाएं लगती हैं। सोनभद्र में विभिन्न प्रकार के खनिज मिलने के कारण आर्थिक रूप से जिले की महत्ता और बढ़ जाती है। सोनभद्र अक्सर यहां की खनन गतिविधियों के कारण सुर्खियों में रहता है। जहां खनन विभाग मानकों की अनदेखी एवं अपनी कथित ‘सक्रिय भूमिका’ के कारण चर्चा में बना रहता है।

नवंबर 2025 में बिल्ली मारकुंडी क्षेत्र में फिर एक हादसे ने अपनी दस्तक दी जिससे वहां काम कर रहे मजदूरों को उन पहाड़ियों ने अपनी गहराई में समा लिया । इससे पूर्व 2015 और 2012 में खदान हादसे ने भयावह रूप लिया था। जिसमें दर्जनों की संख्या में मजदूर मौके पर ही दफन हो गए थे। गरीब मजदूर जो पहले से आर्थिक और सामाजिक उपेक्षा झेलते हुए किसी तरह अपना जीवन यापन करने के लिए जान जोखिम में डालकर मजदूरी को अपना पेशा चुनते हैं उनकी असमय मृत्यु हो जाना आत्मा को अंदर तक झकझोर कर रख देती है। बिना सुरक्षा मानकों जैसे कि हेलमेट और बेल्ट के बिना खड़ी पहाड़ी पर विस्फोट के लिए ड्रिल करना जो कि अपने आप में एक युद्ध लड़ने के समानांतर होता है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन ने खदान मालिकों को खदान के नियमानुसार संचालन और सुरक्षा मानकों के पालन के संबंध में पर्याप्त प्रशिक्षण और दिशा निर्देश दिया था? और अगर दिया गया था और कागजों पर इसकी पुष्टि भी की गई थी तो फिर नियमों और सुरक्षा मानकों के बीच इतनी घोर लापरवाही क्यों? पूर्व से हो रहे सभी घटनाओं को देखते हुए एवं उनसे मिली चेतावनियों और सबक के बाद भी गलती दोहराई जा रही हो तो यह मात्र संयोग नहीं है इसमें जवाबदेही का अभाव एवं अवैध रूप से हो रहे खनन की ओर इशारा भी है। लगातार हो रहे खनन हादसों को देखते हुए सरकार ने सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त पर आधारित, सुदृढ़ एवं पारदर्शी ‘उत्तर प्रदेश खनन नीति 2017’ को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में 30 में 2017 को घोषित की थी।

खनन नीति 2017 और सोनभद्र जिले पर उसका प्रभाव

खनन नीति के मुख्य उद्देश्यों में से एक उद्देश्य है पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकी का संतुलन बनाए रखना। मगर सोनभद्र जिले के ओबरा क्षेत्र में ये गंभीर समस्या बन कर उभरी है। यहां के जनमानस में लगातार प्रदूषण को लेकर विरोध देखा गया है खदानों से निकलने वाली धूल हवा को दूषित कर रही है। अवैध खनन के कारण वहां का भूजल स्तर प्रदूषित होता जा रहा है जिससे किसानों और जनता को गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। जबकि मानकों के आधार पर बस्ती के 100 मी दायरे के अंदर खनन प्रतिबंधित है। सवाल यह है कि इस तरह प्रकृति के लगातार दोहन से आर्थिक विकास का रास्ता तो सुदृढ़ हुआ है मगर दीर्घकालिक समय के साथ विकास कि यह राह जनमानस एवं यहां पाये जाने वाली जनजातियों के लिए भयावह संकट पैदा कर रही है।

खनन नीति 2017 में खनिजों का संरक्षण एक मुख्य उद्देश्य के रूप में शामिल किया गया था। मगर सोनभद्र में व्यवहारिक स्तर पर इसकी कहानी कुछ और ही बयां करती है। यहां प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण से खनिज के इस खेल को और चिंताजनक रूप दे दिया गया है। जहां नियम है कि खदानों की खुदाई समानांतर होनी चाहिए 10 मीटर से गहरी खदानें प्रतिबंधित है वहीं 200 फीट गहरी खदानें आज भी मौजूद है और बरसात के दिनों में पानी भर जाने के कारण मौत को खुला आमंत्रण देती है। आसपास के लोगों से मिली जानकारी के मुताबिक कुछ तो ऐसे मामले होते हैं जो सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आ पाते और शवों को गुप्त रूप से ठिकाने लगा दिया जाता है। इसके बावजूद जिला प्रशासन के नाक के नीचे ऐसी खदानों का संचालन धड़ल्ले से किया जा रहा होता है।

अवैध खनन और पर्यावरण की सुरक्षा जैसे मामलों को जल्दी और प्रभावी रूप से निपटाने के लिए 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ( नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) का गठन किया गया था। सोनभद्र के मामले में पूर्व जिलाधिकारी महोदय पे मात्र दस हज़ार का जुर्माना लगाने से एनजीटी की भूमिका अपेक्षित तौर पर कठोर नहीं दिखाई देती है। इतना मामूली दंड यह संदेश देता है कि लाखों के राजस्व नुकसान व पर्यावरण के अकूत भंडार का अवैध तरह से दोहन करना एनजीटी के मूल उद्देश्य- पर्यावरण संरक्षण और अवैध खनन जैसे गंभीर मामलों पर कमजोर होता प्रतीत होता है।

इस बात को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि खनन गतिविधियां आर्थिक विकास और रोजगार का अच्छा स्रोत है। मगर राजनीतिक एवं प्रशासनिक गठजोड़ के कारण खदानों के नियम पूर्वक संचालन एवं मानकों के पालन को सुनिश्चित करना बेहद मुश्किल हो जाता है। जिससे राजस्व ,पर्यावरण और श्रमिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। खनन विभाग एवं निगरानी एजेंसियों को सुनिश्चित करना चाहिए कि मजदूरों का श्रम भुगतान श्रम अधिनियम के तहत हो। ऐसा करना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत ‘जीवन का अधिकार’ में सुरक्षित वातावरण और मानवीय कार्य परिस्थितियाँ भी निहित मानी जाती है। भारत में खनन व्यवसाय को नियंत्रित करने के बारे में ज्यादातर कानून 1950 के दशक के हैं और वह आज के आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं रह गए। समय की मांग है कि सरकार नए सिरे से खनन से संबंधित कानून पास करे । इसमें अवैध खनन, राजस्व क्षति, पर्यावरण, श्रमिक सुरक्षा, प्रशासन की जवाबदेही, जैसे प्रश्नों का हल जनकल्याण के सिद्धांतों के अनुरूप हो।

सोनभद्र में पूर्व के कई जिला अधिकारियों के कार्यकाल के दौरान खनन घटनाएं हुई है और कुछ काफी विवाद में भी रही हैं। अब जिले में नए जिलाधिकारी महोदय चर्चित गौंड की नियुक्ति के साथ यह अपेक्षा स्वभाविक है कि उनके कार्यकाल में खनन व्यवस्था अधिक पारदर्शी , नियमसम्मत और उत्तरदायी होंगी। पर्यावरण और जनहित के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।

Navhind Samachar
Author: Navhind Samachar

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