लखनऊ। उत्तर प्रदेश की विधान परिषद (एमएलसी) की शिक्षक और स्नातक क्षेत्र की 11 सीटों के आगामी चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रत्याशियों के चयन में जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधने पर विशेष जोर दिया है। पार्टी द्वारा घोषित उम्मीदवारों की सूची में बड़ा फैसला लेते हुए 11 में से कुल पांच सीटों पर ब्राह्मण चेहरों को चुनावी मैदान में उतारा गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम के जरिए भाजपा ने सामाजिक संतुलन बनाने के साथ-साथ हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए दिशा-निर्देशों को लेकर सवर्ण समाज और प्रबुद्ध वर्ग में पनप रही नाराजगी व राजनीतिक बेचैनी को शांत करने की रणनीति बनाई है। चूंकि शिक्षक व स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में सीधे तौर पर उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालयों और बौद्धिक वर्ग के मतदाता जुड़े हैं, ऐसे में इस निर्णय को आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों से पूर्व सवर्ण समाज को साधने और उनकी टीस पर मरहम लगाने के बड़े सियासी संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
भाजपा नेतृत्व ने टिकट बंटवारे में केवल एक वर्ग पर निर्भर रहने के बजाय एक पूर्ण सामाजिक पैकेज पेश करने की कोशिश की है। पांच ब्राह्मण चेहरों के अलावा पार्टी ने तीन अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), दो राजपूत (ठाकुर) और एक वैश्य समाज के प्रतिनिधि को उम्मीदवार बनाकर अपने सर्वसमावेशी आधार को मजबूती दी है। पार्टी के भीतर संगठन स्तर पर भी पिछले दिनों यूजीसी नियमों को लेकर सवर्ण समुदायों में उभरते असंतोष पर चर्चा हुई थी, जिसे ध्यान में रखते हुए इस संतुलित फार्मूले को अमलीजामा पहनाया गया। यद्यपि पार्टी औपचारिक रूप से इन टिकटों को केवल सामाजिक प्रतिनिधित्व का हिस्सा बता रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसे उच्च शिक्षा से जुड़े मतदाताओं के साथ संवाद का जरिया माना जा रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि भाजपा द्वारा दिया गया यह सामाजिक संदेश स्थानीय स्तर पर मतदाताओं के साथ प्रभावी संवाद में बदलकर चुनाव परिणामों में कितना तब्दील हो पाता है।
Author: NAV HIND SAMACHAR
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