सोनभद्र। बच्चों को स्कूल पहुंचाने वाले वाहनों की फिटनेस को लेकर प्रशासन भले ही तमाम दावे करता हो, लेकिन आज सुबह वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग पर उरमौरा ढाबे के पास हुई घटना ने इन दावों की हकीकत पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। छपका स्थित ग्लेनहिल स्कूल के करीब 20 बच्चों को लेकर जा रहे स्कूली वाहन का अचानक अगला चक्का टूट गया। चक्का टूटते ही वाहन अनियंत्रित हो गया और उसमें सवार बच्चों की सांसें अटक गईं। संयोग अच्छा था कि चालक ने किसी तरह वाहन को संभाल लिया और एक बड़ा हादसा टल गया।
सोचिए, अगर चालक कुछ सेकेंड के लिए भी नियंत्रण खो देता तो क्या होता? सड़क पर दौड़ता वाहन, उसमें बैठे करीब 20 मासूम और अचानक टूटता चक्का। यह तस्वीर किसी भयावह हादसे में बदल सकती थी। हादसा नहीं हुआ, लेकिन इस घटना ने स्कूली वाहनों की फिटनेस जांच की पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
फिटनेस प्रमाणपत्र जारी होते हैं या वाहन भी जांचे जाते हैं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या स्कूली वाहनों की फिटनेस वास्तव में जमीन पर जांची जाती है या फिर कागजों में वाहन फिट घोषित कर जिम्मेदारी पूरी मान ली जाती है?
जब बच्चों को लेकर चल रहे वाहन का चलते-चलते अगला चक्का ही टूट जाए तो यह केवल वाहन की खराबी का मामला नहीं है। यह बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल है। आखिर फिटनेस जांच के दौरान टायर, पहिया, ब्रेक, स्टीयरिंग और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी हिस्सों की जांच कितनी गंभीरता से की जाती है?
आज चक्का टूटा है, कल कहीं टूट न जाए जिंदगी –
इस घटना ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। वहीं अभिभावकों ने परिवहन विभाग की जाँच व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कि जब स्कूली वाहनों में मासूम बच्चे सफर करते हैं तो उनकी फिटनेस में किसी भी स्तर की लापरवाही की गुंजाइश कैसे हो सकती है?
अभिभावकों और स्कूल प्रशासन के मौके पर पहुंचने के बाद बच्चों को दूसरे वाहन से सुरक्षित स्कूल भेजा गया। राहत की बात यह रही कि किसी बच्चे को चोट नहीं आई लेकिन यह राहत प्रशासन के लिए चेतावनी भी है क्योंकि यदि वाहन चालक समय रहते वाहन को नियंत्रित नहीं कर पाता, यदि वाहन सड़क पर पलट जाता या सामने से कोई दूसरा वाहन आ जाता तो जिम्मेदारी किसकी होती?
हादसा टला, सवाल नहीं –
घटना के बाद अब जरूरत सिर्फ बयानबाजी की नहीं, बल्कि जनपदभर में स्कूली वाहनों के खिलाफ सघन और वास्तविक फिटनेस अभियान चलाने की है। वाहनों के कागजात देखने भर से बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी। यह देखना होगा कि सड़क पर दौड़ने वाला वाहन वास्तव में सुरक्षित भी है या नहीं।
प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि जनपद में कितने स्कूली वाहनों की फिटनेस जांच हुई, कितने वाहन मानकों पर खरे नहीं उतरे और कितनों के खिलाफ कार्यवाही की गई।
“बहरहाल स्कूल प्रबंधन की भी जिम्मेदारी है कि वह बच्चों को ऐसे वाहनों में सफर न कराए जिनकी तकनीकी स्थिति संदिग्ध हो। वहीं परिवहन विभाग और प्रशासन की जिम्मेदारी इससे भी बड़ी है
मासूमों की जिंदगी किसी फाइल, प्रमाणपत्र या औपचारिक जांच से छोटी नहीं है। आज करीब 20 बच्चों की जिंदगी बाल-बाल बची है। इसे महज एक छोटी तकनीकी खराबी मानकर छोड़ दिया गया तो अगली घटना शायद इतनी मेहरबान न हो।”




