कुशाग्र कौशल शर्मा
सोनभद्र: इसमें कोई संशय नहीं है कि आज हर व्यक्ति के जीवन में चाहे वह स्कूल में पढ़ने वाला छात्र हो ,कार्यरत युवा या फिर कोई बुजुर्ग व्यक्ति सबके रोजमर्रा के जीवन में विज्ञान अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इंटरनेट की तेज और रोमांच भरी दुनिया ने सबको जागरूक तो बनाया ही है साथ में हर व्यक्ति के अंदर सीखने की जिज्ञासा को बड़ी तेजी से जन्म भी दिया है। विज्ञान ने जिस तरह मानव जीवन को सरल एवं आनंदमय बनाया है इसके ठीक विपरीत बच्चों और युवाओं में इसके व्यापक दुष्परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं। सोनभद्र जिले के राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज के छात्रावास में प्रथम वर्ष के छात्र ने खुद को फंदे से लटका कर अपने जीवन के समय चक्र को रोक दिया। पुलिस की जांच में पता चला कि आत्महत्या का मकसद ऑनलाइन गेमिंग था।
विज्ञान के इस युग में ऑनलाइन गेमिंग का इतना बुरा प्रभाव देखने को मिल रहा है जो बच्चों और युवाओं को मानसिक, शारीरिक और सामाजिक स्तर पर बुरा असर डाल रहा है। अक्सर बच्चों को घरों में युवाओं को बाजारों में या खेल के मैदान में बैठकर मोबाइल फोन पर गेम खेलते देख यह कहना गलत नहीं होगा यह दृश्य आधुनिक जीवन शैली का विरोधाभास है।आज भारत में बड़े स्तर पर युवा ऑनलाइन गेमिंग के जाल में जकड़ते नजर आ रहे हैं। भारत एक ऐसा देश है जिसकी संस्कृति में खेल का महत्वपूर्ण स्थान रहा है और ज्यादातर भारत में पहले से खेले जा रहे खेलों का आधार रणनीति और कौशल रहा है। कौशल आधारित खेल मौके की बजाय कौशल को प्राथमिकता देते हैं जो कि भारत में वैध भी है मगर भाग्य आधारित खेल भाग्य को प्राथमिकता देते हैं जो कि भारत में अवैध है। भारत में सबसे ज्यादा दुष्परिणाम भाग्य आधारित खेलों का देखा जाता है जिसको पुराने जमाने के खेलों में जुआ बोलते थे। जो विशेष रूप से कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को आर्थिक कठिनाइयों की ओर धकेल देता था। भारत में डिजिटलाइजेशन की प्रक्रिया ने इसकी पहुंच को समाज के युवाओं तक और आसानी से पहुंचा दिया है और अब तो इसका दायरा भी काफी व्यापक हो गया है। जब पुलिस ने अन्य छात्रों से जानकारी ली तो पता चला की छात्र मानसिक और आर्थिक रूप से ऑनलाइन गेमिंग का शिकार हो गया था वह गेम में लगाए पैसे हारने लगा था और डिप्रेशन में चला गया था। जिसके परिणाम स्वरूप यह देखा गया है कि देश का युवा घंटों तक ऑनलाइन गेम खेलने में व्यस्त रहता है जिससे उनके अंदर आत्महत्या करने जैसा भयावह विचार रूप ले लेता है। सामाजिक मेल-जोल में कमी आ जाती है और आर्थिक बोझ बढ़ने लगता है। भारत की लगभग आधी जनसंख्या 25 वर्ष से कम आयु की है जिसमें से गेमिंग के प्रति लोगों की संख्या बहुत अधिक हो गई है। जो कि देश के युवाओं को ऑनलाइन गेमिंग के जाल में धकेल रही है और उन्हें मानसिक रूप से कमजोर और बीमार कर रही है। भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची में गेमिंग, बेटिंग सट्टेबाजी, जुए का उल्लेख है जिसमें कि राज्य को विशेष शक्ति प्रदान की गई है जिसके तहत राज्य इन विषयों पर कानून बना सकता है। समय की मांग को देखते हुए राज्य एवं केंद्र सरकार को आपसी सामंजस्य बनाते हुए एक ठोस एवं संतुलित कानून बनाने पर जोर देना चाहिए। क्योंकि खेल अगर इंटरनेट या डिजिटल माध्यम से हो रहा है तो केंद्र सरकार हस्तक्षेप कर सकती है। ऑनलाइन गेमिंग के तेजी से बढ़ते विकास के कारण भारत के युवा मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य, आर्थिक धोखाधड़ी के शिकार हो रहे हैं इसका कारण है कि इस क्षेत्र में अभी पर्याप्त नियंत्रण नहीं है। जब तक इस क्षेत्र में नियंत्रण स्थापित नहीं होता तब तक इस क्षेत्र की संभावनाएं जोखिम में बनी रहेंगी।
Author: NAV HIND SAMACHAR
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