आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । एक तरफ प्रदेश सरकार बच्चों से श्रम कराने के खिलाफ सख्त रुख अपनाने और बाल श्रम पर रोक लगाने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर बभनी विकासखंड के रंदह गांव में सरकारी योजना के कार्य में नाबालिग बच्चों से मजदूरी कराए जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि सरकारी आदेशों और नियमों की अनदेखी करते हुए करीब आधा दर्जन नाबालिग बच्चों को जय राम जी योजना के तहत चल रहे कार्य में लगाया गया है। जिन नन्हे हाथों में कॉपी-कलम और किताबें होनी चाहिए थीं, उन्हीं हाथों में फावड़ा और कुदाल थमा दिए गए। बच्चों का भविष्य संवारने की उम्र में उनसे मजदूरी कराए जाने का यह मामला सरकारी योजनाओं की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
बताया जा रहा है कि नाबालिग बच्चे पिछले एक सप्ताह से अधिक समय से योजना के कार्य में मजदूरी कर रहे हैं। यदि ग्रामीणों और सामने आए तथ्यों की पुष्टि होती है तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इतने दिनों तक कार्यस्थल पर बच्चों से मजदूरी कराई जाती रही और संबंधित जिम्मेदारों को इसकी भनक तक कैसे नहीं लगी।
योजना के कार्यस्थल पर नाबालिगों से मजदूरी का आरोप –
रंदह गांव में जय राम जी योजना के तहत कराए जा रहे कार्य में करीब आधा दर्जन नाबालिग बच्चों को लगाए जाने की बात सामने आई है। आरोप है कि बच्चों से मजदूरों की तरह कार्य कराया जा रहा है। उनके हाथों में फावड़ा और कुदाल नजर आने की बात सामने आने के बाद मामला चर्चा में आ गया है।
प्रधान और सचिव की भूमिका लगा प्रश्न चिन्ह –
मामले में ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि योजना के कार्य में बच्चों को लगाए जाने की जानकारी जिम्मेदारों को होने के बावजूद रोकथाम के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
सवाल यह भी है कि योजना के कार्यस्थल की निगरानी कौन कर रहा था? क्या कार्यस्थल का नियमित निरीक्षण किया गया? यदि निरीक्षण हुआ तो नाबालिग बच्चे अधिकारियों की नजर से कैसे बचते रहे? इन तमाम सवालों का जवाब अब जांच के बाद ही सामने आएगा।
कॉपी-कलम की जगह मासूमों की हांथों में थमा दिए फावड़ा-कुदाल –
बच्चों की शिक्षा और उनके सुरक्षित भविष्य को लेकर सरकार लगातार अभियान चलाती है। ऐसे में सरकारी योजना के कार्यस्थल पर नाबालिग बच्चों के मजदूरी करने का मामला सामने आना गंभीर चिंता का विषय है। जिन हाथों में किताबें और कलम होनी चाहिए, उन्हीं हाथों में मजदूरी के औजार होना व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करता है।
जांच हुई तो सामने आ सकती है पूरी तस्वीर –
अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन मामले का संज्ञान लेकर मौके पर निष्पक्ष जांच कराए। बच्चों की उम्र, कार्यस्थल पर उनकी मौजूदगी, कार्य में लगाए जाने और मजदूरी से संबंधित अभिलेखों की जांच के साथ जिम्मेदारों की भूमिका भी स्पष्ट की जाए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्यवाही की जानी चाहिए।
“बहरहाल सरकार बाल श्रम पर रोक और बच्चों के बेहतर भविष्य की बात करती है, लेकिन रंदह गांव से सामने आया यह मामला सरकारी योजनाओं की जमीनी निगरानी पर सवाल खड़ा कर रहा है। बच्चों का भविष्य बनाने की जिम्मेदारी वाली व्यवस्था यदि उन्हीं बच्चों के हाथों में फावड़ा-कुदाल थमा दे तो जवाबदेही तय होना जरूरी है। अब देखने वाली बात होगी कि प्रशासन इस मामले में सिर्फ जांच का भरोसा देता है या वास्तव में जिम्मेदारों पर कार्यवाही कर यह संदेश देता है कि सरकारी योजनाओं में बच्चों से मजदूरी कराने की लापरवाही किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”






