आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । गांवों में संक्रामक बीमारियों की पहचान और रोकथाम के लिए चलाया जा रहा स्वास्थ्य विभाग का दस्तक अभियान इन दिनों खुद चुनौतियों से जूझ रहा है। जिले में 1900 से अधिक आशा कार्यकर्ताओं और आशा संगिनियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल ने ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। घर-घर जाकर लोगों की स्क्रीनिंग करने, संभावित मरीजों की पहचान करने और संचारी रोगों के प्रति जागरूकता फैलाने जैसे महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित हो रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के इस अभियान में आशा कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका के बीच उनके कार्य बहिष्कार ने गांवों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
7 अक्तूबर से धरने पर आशाएं, गांवों में बढ़ी मुश्किलें –
अपनी विभिन्न मांगों को लेकर आशा कार्यकत्रियां 7 अक्तूबर से आशा वर्कर्स यूनियन के बैनर तले अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन कर रही हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी समस्याओं के समाधान के लिए अधिकारियों के चक्कर लगा रही हैं। सीएमओ से लेकर जिला प्रशासन तक कई बार ज्ञापन सौंपे गए, लेकिन अब तक उनकी मांगों पर कोई ठोस निर्णय नहीं हुआ। आखिरकार उन्होंने कार्य बहिष्कार का रास्ता अपना लिया। इसका असर अब ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य विभाग की विभिन्न गतिविधियों पर दिखाई देने लगा है।
दस्तक अभियान पर असर, घर-घर स्क्रीनिंग चुनौती –
दस्तक अभियान और संचारी रोग नियंत्रण कार्यक्रम का उद्देश्य घर-घर पहुंचकर संभावित रोगियों की पहचान करना, संक्रामक बीमारियों के लक्षणों के प्रति लोगों को जागरूक करना और समय रहते मरीजों को उपचार के लिए स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाना है। इस काम में आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। उनके माध्यम से ग्रामीण परिवारों तक स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं और जरूरी जानकारियों को पहुंचाया जाता है। लेकिन हड़ताल के चलते कई स्थानों पर अभियान से जुड़े कार्य प्रभावित होने की जानकारी सामने आ रही है। ऐसे में सवाल है कि यदि आशाओं की अनुपस्थिति में घर-घर स्क्रीनिंग और जागरूकता संबंधी गतिविधियां प्रभावित होती हैं, तो संभावित मरीजों की समय पर पहचान और उन्हें उपचार से जोड़ने की व्यवस्था कैसे सुनिश्चित होगी?
गर्भवती महिलाओं और बच्चों की सेवाओं पर भी असर की आशंका –
आशा कार्यकर्ता केवल दस्तक अभियान तक सीमित नहीं हैं। मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण, परिवार नियोजन और संक्रामक रोगों की रोकथाम सहित ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। वे गर्भवती महिलाओं को जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने, बच्चों के टीकाकरण के प्रति जागरूक करने और जरूरतमंद परिवारों तक स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पहुंचाने का काम करती हैं। ऐसे में लंबे समय तक हड़ताल जारी रहने से इन सेवाओं से जुड़ी गतिविधियों पर भी असर पड़ने की आशंका है। हालांकि आशाओं ने गर्भवती महिलाओं से जुड़े कार्य प्रभावित नहीं होने देने का आश्वासन दे रही है।
काम का दबाव बनाने के बजाय उनकी समस्याओं के समाधान की पहल करें अधिकारी –
आशा कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि हड़ताल के बावजूद अधिकारी उन पर काम करने के लिए दबाव बना रहे हैं, जबकि उनकी मांगों पर अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई है। उनका कहना है कि वे लंबे समय से मानदेय में बढ़ोतरी समेत अन्य समस्याओं के समाधान की मांग कर रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। आशा कार्यकर्ताओं ने दो टूक कहा कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक उनका अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन और कार्य बहिष्कार जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि केवल काम का दबाव बनाने से आंदोलन समाप्त नहीं होगा, बल्कि इसके लिए उनकी मांगों पर ठोस निर्णय लेना जरूरी है।
मानदेय और काम के बोझ को लेकर नाराजगी –
सोमवार को घोरावल में जिलाध्यक्ष मंजू मौर्या के नेतृत्व में प्रदर्शन कर रही आशा कार्यकर्ताओं ने कहा कि वे गांव-गांव जाकर स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं को लोगों तक पहुंचाती हैं। गर्भवती महिलाओं, बच्चों और अन्य जरूरतमंदों को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने के साथ ही उन्हें समय-समय पर अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं। उनका आरोप है कि काम का बोझ लगातार बढ़ रहा है, जबकि महंगाई के मुकाबले मिलने वाला मानदेय उनकी मेहनत के अनुरूप नहीं है। मानदेय में बढ़ोत्तरी समेत अन्य समस्याओं के समाधान की मांग कई बार उठाई गई, लेकिन ठोस निर्णय नहीं होने से उन्हें आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ा।
“बहरहाल बड़ा सवाल यह है कि आशा कार्यकर्ताओं की मांगों और ग्रामीण जनता की स्वास्थ्य जरूरतों के बीच संतुलन कैसे बनेगा? एक ओर अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलन कर रही आशाएं हैं, तो दूसरी ओर उनके कार्य बहिष्कार से प्रभावित होने वाली स्वास्थ्य सेवाएं और दस्तक अभियान जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग के सामने दोहरी चुनौती है कि आशाओं की समस्याओं के समाधान की दिशा में प्रभावी पहल करना और तब तक ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तथा संचारी रोग नियंत्रण गतिविधियों को सुचारु बनाए रखना। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस गतिरोध को खत्म करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।”
Author: Anand Kumar Chaubey
9 years experience in Journalism....






