मिर्जापुर। मंडलीय अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में प्रतिदिन मोबाइल फोन चलाने की लत के दो से तीन मामले आ रहे है। तीन साल के बच्चों से लेकर युवा तक शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कोरियन गेम खेलने वाले बच्चों अजीब व्यवहार कर रहे हैं।
मोबाइल पर गेम खेलने से उनकी मनाेदशा बिगड़ जा रही है। वे गेम के करैक्टर को रोल माॅडल बना ले रहे हैं। कैरेक्टर की तरह बोल और फैशन कर रहे हैं। अभिभावकों के टोकने पर वे आक्रोशित हो जा रहे है और सुसाइड का भी प्रयास कर रहे है।

ऐसे बच्चों की काउंसलिंग करने वाले मानसिक रोग विभाग के नैदानिक मनोवैज्ञानिक डा. राहुल सिंह ने बताया कि मोबाइल चलाते के लती एक नौ वर्ष के बालक की काउंसिलिंग चल रही है। वह तीन वर्ष की उम्र से ही मोबाइल चला रहा है।
वह मोबाइल पर तरह-तरह के वीडियो गेम खेलते-खेलते कोरियन गेम खेलना सीख गया गया। रील्स भी देखता है। वीडियो गेम से उसकी मनोदशा बिगड़ गई। वह वीडियो गेम में मिलने वाले टास्क को पूरा करने लगा। दुश्मन को गोली मारने के साथ उससे लड़ने आदि की बात करने लगा। परिवार वाले उसकी भाषा भी नहीं समझ पा रहे।
घर में भी कोई उसे मोबाइल चलाने से मना करता है तो वह आक्रोशित हो जाता है। गाली देने लगता था। माता-पिता की भी बात नहीं सुनता है उनपर पत्थर आदि चला देता है। रोकने वालों को वह गोली मारने की बात कहता है।
शुरू में उसके अभिभावकों ने बच्चा समझकर उसके बदले व्यवहार को अनदेखा किया। गेम खेलने के साथ ही वह नशा करना सीख गया। बिस्किट व चिप्स के नाम पर पैसा लेकर गुटखा, सिगरेट, भांंग आदि खरीदकर नशा करने लगा है।
इससे उसके अभिभावक परेशान हो गए। उसे मानसिक रोग विभाग लेकर आए। जहां उसकी काउंसलिंग की जा रही है। जरूरी दवाएं दी जा रही हैं
मानसिक रोग विभाग के नैदानिक मनोवैज्ञानिक डाॅ. राहुल सिंह ने बताया कि जो बच्चे अंर्तमुखी (इंट्रोवर्ड) होते है। वो इलेक्ट्राॅनिक चीजो से ज्यादा जुड़ते है। लोगों से कम बात करते है। ऐसे बच्चों से परिवार को बात करते रहना चाहिए। बात होगी तो मोबाइल से दूरी बनी रहेगी। संवाद
Author: Vinod Garg
2 years experience in the field of journalism.





